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Archive for July, 2009


अब तो उनकी नज़रे नहीं मिलती,
ख़ामोशी हैं हर तरफ, मंजिल नहीं मिलती|
तन्हाई से अजीब सा रिश्ता बन गया हैं,
कभी आँखें नहीं मिलती, कभी रौनक नहीं मिलती|
सुना था, ये दुनिया की रीत हैं,
कसूरवार को मुक्ति, बेक़सूर को सजा नहीं मिलती,
मेरी नज़रों में मेरी दुनिया है वो,
बड़ा मजबूर हूँ, मुझे मेरी दुनिया नहीं मिलती|
इमारते खड़ी करते-करते यूँ ख्याल आया,
ढुंढा जो नीचे, बुनियाद नहीं मिलती|
बेआबरू होकर लोटे है, हर एक चिराग से,
दीप तो मिल जाता है, लौ नहीं मिलती|
धुल गया है दिल का हर एक कमरा,
अब आँख नहीं मिलती, लब पे शिकायत नहीं मिलती|
कर बैठे थे बगावत उस खुदा से हम,
उस खुदा से रहम नहीं मिलता,
इस खुदा की नज़रे नहीं मिलती|
ख़ामोशी हैं हर तरफ, मंजिल नहीं मिलती| 
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वो आयें  तो कुछ यू याद आयें,

हम हुए तन्हा, और तन्हाई में वो ही नज़र आयें।।

 

कुछ खुशनशी यादों को यूं संजोया है हमने,

कि यादों के झरोखें से रौशनी नज़र आती है।

सोचते है कि ना डूबें इन यादों में,

पर इन्ही यादों में डूब कर तो जन्नत नज़र आती है।।

 

वो जिन्दगी की रातें भी कुछ अजीब थी,

कभी हुई मोहब्बत तो नींद न आई,

तो कभी जुदाई ने नींद उडाई।।

 

प्यार करने वालों का ये अंजाम होता हैं,
कभी आँखें रोती हैं,  तो कभी दिल रोता हैं ।।

 

ना चाहो किसी को इतना, कि उसकी चाहत तुम्हारे लिए जरूरी बन जाए,
उसके बिना जीना बन जाए कल्पना, और मरना मजबूरी बन जाए।।

 

कोई दिल में बस जाए तो हम क्या करें,
कोई आँखों में छा जाए तो हम क्या करें,
सपने में मुलाकात तो उनसे हम कर लेंगे,
पर गर नींद न आये तो हम क्या करें।।

 

आग जलती रही, बू आती रही, धुआं उठता रहा,
आखिर में जाकर पता चला, ये तो मेरा ही दिल था।।

 

हरदम चाहा ख़ुशी को, गम के पहाडों को पीछे छोड़ चला,
पर जब देखे सर के ऊपर गम के बादल,  तो ख्वाब मेरा बिखर गया।।

 

 

*****भरत***

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