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Archive for May, 2010


गुरुदेव श्री महाप्रज्ञ जी को समर्पित एक छोटी सी रचना
 
महाप्रज्ञ मानवता के मसीहा, इस दुनिया के संत महान|
जैन जगत के दिव्य भाल पर, अंकित चन्द्र सामान|
तुमको किन शब्दों में बांधू, तुमको कोटि-कोटि प्रणाम|
 
मानव थे मानव बनकर मानवता ही कर्म रहा,
मानवता के लिए जिए तुम, मानवता ही धर्म रहा,
तुमको कैसे मानव कह दूं मैं, तुम हो ईश सामान|
 
लोभ मोह ममता को छोड़ा, स्वार्थ तुम्हे नहीं भाया,
मुनि जीवन स्वीकारा तुमने, कंटक पथ ही रास आया,
तुमको मैं क्या-क्या संज्ञा दूं, बोलो-बोलो युगप्रधान|
 
अपने पथ पर चलते चले तुम, कभी राह में रुके नहीं,
हर जिम्मेदारी को निभाया, उसमे भी तुम चुके नहीं,
हम पर यूँ ही आशीर्वर रखना, हे! हम सब के अभिमान|
तुम मानव नहीं महामानव थे, तुमको भारत का प्रणाम||

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नारी को समर्पित ये कविता….
 
नारी अबला नहीं है, यह उस पर निर्भर है की वो प्राणदायी बनाना चाहती है या प्राणहर्ता…. दुनिया को वो एक और सृजनकर्ता देना चाहती है या फिर बनना चाहती है एक संहारक…….
 
आने दो, मुझे आने दो,
बस एक बार मुझे आने दो|
 
ये आवाज़ कहाँ से आई है,
कुछ इधर देख,
कुछ उधर देख,
ये कौन मुझे पुकार रहा…….
 
आने दो मां, आने दो,
बेटी का धर्म निभाने दो,
बस एक बार मां मुझे,
इस दुनिया में आने दो|
 
क्यूँ दबा रही हो हस्ती को,
मुझको आवाज़ उठाने दो,
मुझेको आने दो|
 
मां तुम भी तो एक बेटी हो,
मुझको भी ये हक पाने दो,
तुम रूप सरस्वती, दुर्गा का,
बस अंश रूप पा जाने दो,
मैं ज्योति बन कर उभरी हूँ,
मुझको ज्वाला बन जाने दो|
 
हरदम सहा है सौतेला व्यवहार,
नहीं मिला तुम्हे बेटे सा प्यार,
बस हरदम रही तेरी पुकार,
बेटी हूँ मैं माँ तेरी,
मुझको आवाज़ उठाने दो,
आने दो, मुझे आने दो,
इस कोख से मां तेरी,
मुझको बाहर आ जाने दो,
आने दो, मुझे आने दो|
 
मां,
बेटी होती सहनशील,
बेटी होती जीवन आधार,
हर गम यु ही सह जाती है,
करती है न जाने कितने त्याग,
बेटी बनकर बांटे खुशियाँ,
मां बनकर बांटे असीम प्यार,
मुझको भी इस सागर में,
प्यार के गोते लगाने दो,
आने दो, मुझे आने दो|
 
वात्सल्य तुम्ही मां, प्यार तुम्ही,
फटकार तुम्ही मां, पुचकार तुम्ही,
बच्चों के लिए वरदान तुम्ही,
गर लगता तुम्हे गलत जरा,
मेरा दुनिया में आ जाना,
ना आने दो, ना आने दो,
मुझको अन्दर मर जाने दो|
 
ना देना खुद को दोष कभी,
ना रोना मुझको खो कर कभी,
ना दुनिया मेरे लायक बची,
गर लगता तुम्हे गलत जरा,
मेरा दुनिया में आ जाना,
ना आने दो, ना आने दो,
मुझको अन्दर मर जाने दो|
मुझको अन्दर मर जाने दो|

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सागर तो सागर हैं, क्या कोई माने,

आँखों का धोखा तो प्यासा ही जाने,

उजले है दिन और उजली ही रैन हैं,

सुख की चाह में उजड़े ये चैन हैं,

क्यों रोई ये धड़कन क्यों रोये ये नैन हैं,

आकर के देख ये तो नज़रों की देन हैं,

नज़रों का धोखा ये क्या कोई जाने,

सागर तो सागर हैं, क्या कोई माने|

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तन्हा दिल को और तन्हा कर गए,
जब बीच महफ़िल अजनबी कह गए|
उजड़ ही गया बसेरा मेरा,
आब-ए-तल्ख़ पीकर रह गए|
बेमानी हुए सब रिश्ते नाते,
अश्किया जब वो हो गए|
ऐतराज हम क्या करते,
ऐतबार किसका करते,
दिल में एक छोटा सा घाव था,
एक खंजर वो भी दे गए|
वक़्त का तकाजा था या मेरी तकदीर थी,
सदियों के वादे पलों में रह गए|
दिल के तख़्त-ओ ताज की थी उम्मीद,
ठोकर क्या लगी ख़ाक हम रह गए|

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जलाया जो गम को सीने में,
सांसों का दम सा घुटने लगा,
तडपती हुई यादों ने झंझोड़ा जब दिल को,
सिसकती हुई सांसों का धुआं सा हुआ,
बात जब पहुंची आँखों तक,
बीती हुई बातों का पानी सा बहा,
गम की तपिश कुछ कम सी हुई,
सीने की साँसें कुछ नम सी हुई,
आज भी गम का ये फ़साना हुआ,
खाक में न मिला, दफ़न ही हुआ|

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जब से रौशनी मुझे डराने लगी हैं,
अंधरों से दोस्ती मुझे भाने लगी है,
तन्हाई भी रास आने लगी हैं,
लगता है, गम ही बन गया मुक्कदर मेरा,
ख़ुशी भी नज़रें चुराने लगी हैं|
 
मुस्कराहट भी मुझको बेमानी लगी हैं,
क्यों दुनिया भी मुझको बेगानी लगी है|
 
क्यों ख़ामोशी लगती मधुर तान जैसी,
क्यों मरघट भी मुझको तो मंदिर लगे है|
 
क्यों हंसी में भी लगता है क्रंदन मुझको,
क्यों आंसू में मुझको तो ख़ुशी सी मिले है|
 
न मिलाता सुकून दुनिया में कही भी,
क्यों रिश्ते भी मुझको तो बंधन  लगे हैं|
 
उदासी के मेले लगे हर तरफ है,
लबो से हंसी रूठ जाने लगी है,
परछाई भी लगे गैरों जैसी,
तन्हाई ही रास आने लगी हैं,
गम ही बन गया है मुक्कदर मेरा,
ख़ुशी भी नज़रें चुराने लगी हैं|

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जब यादों के बादल आँखों में उतर आते हैं,
तो हम भी कुछ पल के लिए शायर बन जाते हैं|
 
 
भोर की आहट, पंछी चले गए,
रात क्या ढली सितारें चले गए,
चलती राह में साथी चले गए,
खेल दी प्यार की बाजी उसी सनम के नाम,
वो जीतते चले गए,
हम हारते चले गए|
 
 

चाहा भी नहीं पाया भी नहीं, सब कुछ लुटा बैठे;
ना ख़ुशी मिली ना गम, सब कुछ ही गवां बैठे;
इकरार-ए-वफ़ा का अंदाज़ निराला था,
जो माँगा उसने दिल, हम जाँ ही गवां बैठे|

 
 

दर्द से रिश्ता है मेरा,
गम के घूंट पिया करता हूँ,
बांटता हूँ खुशीयाँ सबको,
गम का सौदा किया करता हूँ|

 
 

चलती राह में कुछ यूँ ही पत्थर मिल जाते हैं,
पथिक चलती राह में इन्हें ठोकर मार जाते हैं,
न मारों ठोकर इन्हें, ये ठोकर के हकदार नहीं,
किया है प्यार इन्होने, किया कोई गुनाह नहीं,
वफ़ा की राहो पर किया अपना सब कुर्बान हैं,
पर महबूब की मेहर से,
आज, रास्ते का पत्थर इनका नाम है।

 
सीने की धड़कन चुरा कर,
आँखों में अरमान दिया करतें हैं,
नज़रें यु मिलाते-मिलाते,
नींदें चुरा लिया करते हैं, 
झुकती है जब-जब पलकें उनकी,
हम हौले से मुस्कुरा लिया करतें हैं|
 
 
इंतज़ार अब उसी का करतें हैं,
एक नहीं हज़ार बार याद करतें हैं,
दिल को अब कैसे समझाएं हम,
इन्सां से नहीं, पत्थर से प्यार करतें हैं|
 
 

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