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Archive for October, 2010


एक बार सेठ जी को,

कुछ शौक यूँ हो आया,

तभी,

नौकर रखने का ख्याल उन्होंने आजमाया|

अख़बार में नौकरी का,

विज्ञापन उन्होंने निकलवाया|

कुछ व्यक्तियों को उन्होंने,

साक्षात्कार हेतु बुलवाया|

 

साक्षात्कार के दिन:

पहला व्यक्ति अन्दर आया,

अन्दर आकर उसने हाल चाल पूछा और,

अपना परिचय करवाया,

सेठजी को उसके,

अनुभव का ख्याल आया|

 

उन्होंने पूछा-

कभी कहीं कोई काम किया है,

उसका Certificate लिया है,

बस वो हो तो हमे दिखला दो,

बाकी हमे तुम पर विश्वास हैं|

 

वो व्यक्ति बोला,

सेठजी, सर्टिफिकेट-वर्तिफिकेट नहीं रहे,

कुछ और सबूत हमारे पास है,

आपके पडोसी राम लाल जी के यहाँ नौकरी की,

उनके पास चार घड़ियाँ थी,

वे घड़ियाँ अब नहीं रही,

वे घड़ियाँ हमारे पास है|

 

एक और पडोसी, श्यामलाल जी के यहाँ,

नौकरी की थी,

उनके पास 5 सोने की चैन थी,

वे चैन भी अब नहीं रही,

वो पांचों चैन हमारे पास है,

सेठ मोहन दास के यहाँ नौकरी की,

उनके पास 10 सोने की अंगुठिया थी,

वे भी उनके पास नहीं रही,

वे भी हमारे पास हैं|

 

मालिक आपकी तिजोरी की चाबी,

जो अब तक आपके पास थी,

वो चाबी भी अब नहीं रही,

वो चाबी हमारे पास है|

 

सेठ जी अब हम आपको और क्या दिखाए,

अब तो आपको हम पर विश्वास हैं|

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याद हमको आती है, क्या तुझे जरा आती नहीं,

आँखें आंसू छलकाती है, सूख यू जाती नहीं,

माँ बुलाती है तुझे, हरदम मेरे सीने के लाल,

भूल कर भी ना ये कहना, माँ बुलाती ही नहीं|

 

वो मुंह में डाली जो मिट्टी, याद करती है तुझे,

वो गाँव की गलियां भी तेरा नाम कहती है मुझे,

वो स्कूल की दीवारे तो तुझको भुलाती ही नहीं,

क्या दादी की यादे भी तेरी आँख छलकाती नहीं|

भूल कर भी ना ये कहना, माँ बुलाती ही नहीं|

 

बैरंग है तीज त्यौहार, मजा इनमे आता नहीं,

वो संगी साथी कहते है, क्यों नज़र अब आता नहीं,

वो खेल वो मैदान जिनमे खेलता था तू कभी,

वो पेड़ वो मंदिर, जिन्हें तू पूजता था कभी,

भूल गया है सब, या याद आती ही नहीं|

भूल कर भी ना ये कहना, माँ बुलाती ही नहीं|

 

आ तेरी राहो में जाजम पलकों के है बिछे,

पत्तो की सी सरसराहट, देती तेरा आभास मुझे,

रात की आहट से ही जग जाती हूँ मैं चौंक कर,

लौट के आजा कि ये आँखें अब रूकती नहीं|

भूल कर भी ना ये कहना, माँ बुलाती ही नहीं|

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एक भिखारी सत्संग में जाता हैं,

वहां एक छोटी सी सीख पाता हैं,

भगवान के घर जो भी झोली फैला कर जाता हैं,

वो कुछ न कुछ जरूर पाता हैं|

 

यही सोच,

मंदिर के बाहर अपना डेरा जमाता है,

दिन भर बैठा रहता है,

पर भीख में कुछ ना पाता हैं,

शाम ढले महखाने की तरफ आता है,

सोचता है,

आज तो फ्री की उड़ा लूँगा,

नकद नहीं तो क्या, उधार से काम चल लूँगा,

तभी एक शराबी बाहर आता हैं,

100 का नोट भीख में थमाता हैं,

ये देख भिखारी मन ही मन बडबडाता हैं,

वाह भगवान वाह,

सबको तू अच्छा भरमाता हैं,

मिलता है दारू के ठेके पे,

और Address मंदिर का बताता हैं|

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आज मानव खुद ही,

मानव से डरने लगा हैं,

खुद अपनी ही परछाई से,

दूर भागने लगा हैं,

आज इस कलियुग में,

तुच्छ स्वार्थ की खातिर,

मानव दूसरों को नहीं,

खुद को ही मारने लगा हैं|

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मेहनत और चापलूसी का योग हैं,

ये लोग जिसे Appraisal कहते हैं,

ये तो एक रोग हैं|

 

कुछ नहीं हैं, बस प्रबंध का जाल है,

अपने स्वार्थ सिद्ध करने की ढाल हैं,

कैसी ये प्रबंधन की चाल हैं,

15%  की मुद्रा स्फीति पे,

सिर्फ 5% की दे दी वृद्धि,

 

खुद तो होटल में भी खाए तो छुट है,

और कर्मचारी गर Toilet paper,

प्रयोग करे तो उसमे भी लूट हैं|

 

कोस्ट कटिंग की अजीब माया है,

खाना पीना तो छुट ही गया,

नौकरी पर भी खतरा आया हैं,

कर्मचारी के साथ रिश्ते और,

प्रतिबद्धता से बड़ी हो गयी माया,

1 वफादार को हटाया,

उसकी जगह दो चापलूसों को लगाया|

 

कोरे वादों का जमाना रह गया,

काम करो कम, दिखावा ज्यादा रह गया,

उन्नति के मायने बदल गए,

काम की पूछ कम,

मक्खन के ही नाम रह गए,

 

छोटी हो गई है सोच,

और बढ़ गए असीमित इरादे,

पैसे का ही मोल है,

हमारे शौक बदल गए हैं,

साथी का गला काट कर जो ख़ुशी मिलती हैं,

उसका तो कोई मोल ही नहीं हैं,

यही हाल रहा तो किसकी होगी वृद्धि…………..

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ससुराल में रहती है,

दिन चढ़ने तक सोती है,

पति से झाड़ू लगवाती हैं,

बेड टी पति से पाती हैं,

वही सफल पत्नी कहलाती हैं|

 

कपडे भी पति से धुलवाती हैं,

उसी से प्रेस करवाती हैं,

खाने औए नाश्ते में नित,

नै फरमाइशे लाती हैं,

सहेलियों से फोन पर,

दिन भर गप्पे लड़ाती हैं,

वही सफल पत्नी कहलाती हैं|

 

पति से पानी भरवाती हैं,

सब्जी सामान मंगवाती हैं,

शाम को खाना बनवाती हैं,

बर्तन भी धुलवाती हैं,

रात को पैर दबवाती हैं,

मनुहार भी करवाती हैं,

वही सफल पत्नी कहलाती हैं|

 

करवा चौथ का व्रत रखती हैं,

दिन भर कुछ ना खाती है,

इस जीवन में हो लम्बी उम्र,

और अगले जन्म में यही पति मिले,

इसलिए ये तिकड़म लगाती हैं,

अगला जन्म सुधारने हेतु,

अभी से उपाय अपनाती हैं,

वही सफल पत्नी कहलाती हैं|

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नेताजी बैठ्या कुर्सी पर, फेविकोल लगाय,

जामे जितना जोर है, आय आय आजमाय||

 

नेता घर घर फिरही, वोट मांगन जाहि,

अब वे वादे भूलहि, अब वे भिखारी नाहि||

 

CBI ने खींच कर, आवाज़ ऐसी लगाईं,

पेन्ट हिलने लगी नेता की, उड़ने लगी टाई||

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