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Archive for February, 2011


भीड़ में रह कर भी गुमनाम सा हूँ,
अपने खड़े हज़ार, पर अनजान सा हूँ,
देता हूँ खुशिया हर एक चाहने वाले तुझे,
फिर भी तेरे बाज़ार में क्यों बे-दाम सा हूँ|

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बदल गयी है दुनिया सारी, खुशियाँ सिमट गयी हैं,
समय नहीं है मरने का, यूं जिन्दगी गुज़र रही है|
 
घर का आँगन बहुत बड़ा था, 
खेल खेल थक जाता था,
लम्बी थी वो गाँव की गलियां,
चलते-चलते थक जाता था,
मेल होते थे बहुत बड़े,
हर ख़ुशी वहां मिल जाती थी,
वो कुल्फी कचोरी और जलेबी में,
दुनिया सारी सिमट जाती थी|
अब तो 
पंख लगा कर मैं,
US तक हो आया हूँ,
पिज्जा बर्गर की तो बात ही क्या,
हर खाना मैं चख आया हूँ,
मेल-माले का झंझट कहाँ,
मालों में शापिंग करता हूँ,
सब कुछ मिलता है जीवन में,
फिर भी क्यूँ सूना लगता हैं,
दुनिया हो गयी है बहुत बड़ी,
या दुनिया सिमट गयी है,
खुशियाँ हो गयी है अथाह या,
खुशिया सिमट गयी हैं|
 
वो संगी साथी मिलते थे,
वो क्रिकेट खेला करते थे,
वो शर्त लगा कर पैसे की,
कोल्ड ड्रिंक पिया करते थे,
वो व्रत तोड़ कर ठेले पर,
कचोरी खाया करते थे,
वो घर में बिना बताये ही,
बंक कर जाया करते थे,
वो थक कर चूर हो जाते तो,
घर में आ जाया करते थे,
मम्मी की प्यारी थपकी से,
हर दर्द मिट जाया करते थे,
वो शाम – कहानी दादी की,
उसमे खो जाया करते थे,
वो खेल पतंगे मस्ती के,
लम्हे मिल जाया करते थे,
अब
हजूम हजारों लाखों के,
वो निर्मल मन कहाँ मिलते,
है दोस्त यहाँ पर मतलब के,
बस हेल्लो हाई किया करते,
वो जन्म दिवस पर उनके तो,
SMS आ जाया करते हैं,
घर में गर कोई ख़ुशी,
बस कार्ड आ जाया करते है,
वो शाम कहाँ अब होती है,
सीधे रात हो जाती हैं,
सुबह का सूरज दिखता नहीं,
दिन भी ढल जाया करता हैं,
हम हो गए है व्यस्त यहाँ,
या घड़ियाँ सिमट गयी है,
दोस्त बढ़ गए हैं यहाँ,
या दोस्ती सिमट गयी है|
 
कल सपने देखा करते थे,
दिल में आहे भरते थे,
अब
सपने पूरे करते हैं,
या सपनों में ही जीते हैं,
कल की कोई बुनियाद नहीं,
हम हर पल काटा करते है,
जिन्दगी ने कहा- तुम जियो मुझे,
हम तो इसे काटा करते है,
क्या फर्क पड़े,
गर सीखे हम,
जीना फिर उसी शान से,
तमन्ना भरे इस जीवन में,
क्यूँ भाग रहे, क्यूँ भाग रहे| 

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