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Archive for January, 2016


दुनिया के छलावों से फारिग होना चाहता हूँ,

मैं अब जी भर कर सोना चाहता हूँ |

मिट्टी के वो घरोंदे बनाते,

सुन्दर भावी के सपने संजोते,

फिर बचपन की यादों में खोना चाहता हूँ,

मैं अब जी भर कर सोना चाहता हूँ |

दिन भर की भाग दौड़ से त्रस्त ,

होकर हालातों से पस्त,

सुख चैन कमाना चाहता हूँ,

मैं अब जी भर कर सोना चाहता हूँ |

प्रगति के सोपान चढ़ने में,

साँसे कुछ उखड़ने सी लगी है,

“भरत” अब साँसे शुकून की चाहता हूँ,

मैं अब जी भर कर सोना चाहता हूँ ||

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जज्बात लेकर चला था कुछ,

अरमान लेकर निकला था कुछ,

राहे भी वो अजीब थी,

राही भी कुछ अजीब थे,

चलता रहा बिना रुके,

चलता रहा बिना थके,

ना कोई हिसाब था,

ना कोई परवाह थी,

आज मंजिल पर पहुँच कर,

पता चला अ “भरत”

मंजिले बहुत महँगी थी,

सारे अरमान खर्च हो गए||

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