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Archive for February, 2018


सोच रहे थे, समझ रहे थे,

मान रहे थे, ठान रहे थे,

साल भर से फसल उगाई,

मन में लड्डू बाँट रहे थे,

पर बैठे जब मीटिंग में,

हो गया सब डिफरेंट,

मिल गया इस बार भी,

2 परसेंट का इन्क्रीमेंट,

 

काहे मनवा तू रोता है,

गीता पे चिंतन ना करता है,

कर्म किये जा बस तू अपना,

फल की चिंता क्यों करता है,

कार्य किये जा नित्य नए,

करता रह इक्सपेरिमेंट,

मिल गया इस बार भी,

2 परसेंट का इन्क्रीमेंट,

 

तू चाहे छुट्टी स्वाहा कर,

तू चाहे परिवार छोड़ दे,

ऋषि मुनि की तरह चाहे,

तू अपना घर बार छोड़ दे,

नहीं मिलेगा फिर भी तुझको,

कोई कॉम्प्लिमेंट,

मिल जाएगा ठेंगा तुझको,

2 परसेंट का इन्क्रीमेंट,

 

फिर आएगा अप्रेल महिना,

करने तुझसे छल,

नए नए सपने रंगीले,

मन में फूटे लड्डू रसीले,

फिर से एम्प्लोई को,

ललचाएगा मेनेजमेंट,

दे देगा टाफी तुझको,

2 परसेंट का इन्क्रीमेंट,

 

टेंशन से तो मरे आदमी,

हर ख्वाब को धरे आदमी,

जी भर कर के काम करे,

200% दे आदमी,

फिर भी अंत में सुनना पड़ता,

क्या किया डिफरेंट,

थमा दिया ये बोल के,

2 परसेंट का इन्क्रीमेंट,

 

क्या लेकर तू आया है,

क्या लेकर के जाएगा,

न मिला है, ना मिलेगा,

यु खला है, यु ही खलेगा,

जो तुझको इस बार मिला है,

कल किसी और को मिलेगा,

कोपी पेस्ट हो जायेगा,

यही डॉक्यूमेंट,

मिला जाएगा उसको भी,

2 परसेंट का इन्क्रीमेंट||

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निकला था जिंदगी की राह में,
संगी साथी सब थे साथ मे,
हाथ मे हाथ डाले रखे,
सबके साथ चलने की चाह में,
कोई जीत की चाह में दौड़ता रहा,
ख्वाहिशो के अंबार में,
“भरत” हाथ छिटक के छूटता रहा,
सब कुछ पाने की चाह में…..

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