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Archive for the ‘bharat Begwani’ Category


माँ चाहता हूँ बहुत रोकना,
पर यह दिल नही रुक पाता है,
याद तेरी आते ही दिल पागल सा हो जाता है॥
बस रो कर ही रह जाता है॥
वो बाते याद आती है,
वो लम्हे याद आते है,
ये आंखे आंसू बरसाती है,
जब वो दिन याद आते है।

वो रातो को जागती थी,
जब मैं टीवी में खो जाता था,
वो उठ उठ कर झांकती थी,
जब मैं किताबे रख सो जाता था,
वो उठ उठ कर डांटती थी,
मैं परीक्षा के दिनों में जल्दी सो जाता था,
आधे घंटे तो सोने दो,
यह कह कर बड़ा मजा आता था,
वो सुबह सुबह जब चार बजे,
वो मुझको जगाने आती थी,
मैं एक बार तो उठ जाता था,
पर आंख फिर लग जाती थी,
वो प्यार से जब माँ मेरी,
कड़क चाय बना कर लाती थी,
बस एक चुस्की चाय की,
हर नींद उड़ जाया करती थी,
वो मेरी परीक्षा कम होती,
माँ की परेड लग जाया करती थी,
जब परिणाम आता था,
माँ मन मोद मनाया करती थी।
मेरी खुशियों में उसकी,
हर सिसकी दब जाया करती थी।
अब उस चाय को तड़पता हूँ,
उस परीक्षा को मचलता हूँ,
वो सुबह फिर आ जाये,
पर यह ख्वाहिश अब नही मिलती।

वो सुबह सुबह जगाती थी,
स्कूल को देर हो जाएगा बतलाती थी,
वो गर्म पानी ठंडा हो जाएगा,
आवाज़ लगा लगा कर बतलाती थी,
नाश्ते में क्या खायेगा,
पूछ पूछ कर बनाती थी,
जबरदस्ती दूध का गिलास,
हाथ मे थमाती थी,
करता था मैं खूब नखरे,
कभी अगर इच्छा न होती तो,
आज तबियत तो ठीक है कह कर ,
इर्द गिर्द चक्कर चार लगाती थी,
स्कूल के लिए तैयार कर,
दो टॉफी या बादाम या कुछ खर्चा पकड़ाती थी।
माँ आज भी वही बाते है,
पर सुबह जगाने की बात नही मिलती,
स्कूल की जगह आफिस है,
पर वो टॉफी नही मिलती।

माँ सुबह सुबह जब प्यार से
तू हलवा बनाती थी,
खुशबू कमरे तक आते ही,
बांछे तो खिल जाती थी,
आस पड़ोस से जब कोई मिठाई आती थी,
वो बांट के तू खिलाती थी,
ज्यादा में लूंगा, इस बात की,
बहन से लड़ाई जब हो जाती थी,
चुपचाप रसोई से जब भी,
मिठाई चुराई जाती थी,
वो मन खुश हो जाता था,
जब डांट पिलाई जाती थी,
वो मन किलस जाता था,
जब ये देख बहन मुस्काती थी,
अब तो वो मस्ती के,
दिन कहा फिर मिलते है,
वो जो कटी चुपचाप चिकोटी,
आज तो हम तरसते है।

वो बहन के साथ झगड़,
छत पर भग जाया करता था,
धमका कर, बहला कर,
मुझको फुसलाया जाता था,
मां पास बैठा कर मुझको,
जब कुटवाया जाता था,
फिर समझदार बतला कर,
मुझको बहलाया जाता था,
फिर चुपके से कुछ देकर,
मुझको मनाया जाता था।
माँ फिर ले जाओ उस बचपन मे,
वो शरारत आज नही मिलती।

वो सर्दी के मौसम में
जब भी तबियत ढीली हो जाती थी,
या जुकाम भी हो जाती थी,
अदरक वाली चाय या उकाली,
माँ मेरी ले आती थी,
लिपटे लिपटे रजाई में,
मेरी हर इच्छा मिल जाती थी,
और माँ के बुने स्वेटर में,
ठंड आने से कतराती थी,
मन मे अजीब सा लगता था
जब कानो में स्वेटर टोपी की,
हिदायते दी जाती थी,
सब चीजों की आजादी है अब,
पर वो हिदायते अब नही मिलती।

वो धूप में पतंगे उड़ाता तो,
मुझको समझाया जाता था,
वो देर रात तक खेलो तो,
समय बताया जाता था,
वो घर पर आते ही,
मनपसंद खाना मिल जाया करता था,
वो खेल पतंगे मस्ती के लम्हे,
मिल जाया करते थे,
वो गेंद खरीदने के लिए,
माँ से पैसे मिल जाया करते थे,
वो देर रात को हो जाए तो,
उलाहने मिल जाते थे,
की कब तक तेरे लिए,
में यू ही जागती रहूगी,
तेरे पीछे भागती रहूगी,
जब तेरी बीबी आएगी,
तब बतलाऊंगी,
ये चाय के लिए मुझे इतना भगाता है,
जब शादी हो जाएगी,
तब बनवाऊंगी,
आज तो तू मुझे इतना तड़पाता है,
तब मैं भी तुझे बताउंगी,
मां तुम सब सच कहती थी,
अब वो चाय नही मिलती,
सब कुछ मिल जाता है,
पर तेरी डांट नही मिलती।

वो सर्दी अब भी आती है,
वो गर्मी अब भी आती है,
वो सुबह अब भी होती है,
वो राते अब भी ढलती है,
वो त्योहार अब भी आते है,
कुछ लम्हे भी मिल जाते है,
पर फिर भी सुना लगता है,
वो गोद आज नही मिलती,
वो झिड़की आज नही मिलती,
वो थपकी आज नही मिलती,
घर आने पर भी वो तकती आंख नही मिलती,
मिला बहुत कुछ जीवन मे,
पर वो आजादी नही मिलती…….

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जिन्दगी से हर कदम एक ही तमन्ना है,

वो मेरे से कुछ ऐसा ना करवाए,

जो किसी को दुखी कर दे|

 

जिन्दगी से एक ही गुजारिश है,

ना लाये वो पल कभी,

जो मेरे साथ रहने वालों को तन्हा कर दे|

 

जिन्दगी से कोई शिकवा ना हो,

गर आए दुःख के पत्थर राहों में,

तो हंस के हटा दू उसे,

गर दे मुझे ख़ुशी के पल,

तो बाँट दू हर एक में उसे,

जिन्दगी तू मुझे जिस भी हाल में रखे,

तेरा शुक्रिया हर पल करता रहूँ||

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