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Archive for the ‘Just मोहब्बत’ Category


थी तमन्ना शीशे की पत्थर से टकराने की,

टूट कर उसके चारों तरफ बिखर जाने की,

थी तमन्ना मोहब्बत सागर में उतर जाने की,

थाम के उसका हाथ डूब जाने की,

थी तमन्ना मेहंदी कि तरह घूल जाने की,

सुख कर भी उसके हाथों में रह जाने की,

थी तमन्ना उसमे यूँ राम जाने की,

बन कर अक्स उसका, आईने को झुठलाने की,

थी तमन्ना दिए में बाती बन जाने की,

जल कर भी उसमे अहसास रह जाने की,

थी तमन्ना ना भुलाये जाने की,

ना रुलाये जाने की,

ना ठुकराए जाने की,

ना चुभाये जाने की,

क्या जरुरत थी यु रंग बदलने की,

क्या जरुरत थी यु अलविदा कहने की,

चुपचाप खुशबू की तरह हवा हो जाती,

क्या जरुरत थी कुचलने की,

 

अ “भरत” ऐसा नहीं है कि,

अब जरुरत नहीं रही,

तुझे पाने की हसरत नहीं रही,

ये भी नहीं है कि,

मचलती तमन्ना नहीं रही,

बस टूट के बिखर जाने की हिम्मत नहीं रही||

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भोर हुई, आँखों ने ढूंढा,
मेरे साथी, इधर उधर,
तेरे बिन लगा अधुरा,
ये कैसा आया सवेरा,
आँखों से दो मोती छलके,
गालों पर आकर के बोले,
नहीं करेंगे आगे क्रंदन,
आ कर कर लो अब आलिंगन।

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Muskuraahat chahre ka har dard chhupa jaati h,
Khamoshi bhi dil ka har dard dabaa jaati h,
Jindgi ki raho me Bharat yakin kare kiska,
Kaliya bhi Kaanton se gahri chot de jaati h.

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मंजर मोहब्बत का देखा तूने,
दिल में छुपा दर्द ना देखा,
शमा को रोशन देखा तूने,
पर जलता परवाना ना देखा,
पाकर तुझे मिला मुक्कमल जहाँ मुझको,
टूटा किसका घरोंदा, तूने ना देखा|

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वो दर्द की लौ को बुझा दिया,
आँखों का झरना सुखा दिया,
दिल में घुस कर क्या बैठे,
बस प्यार करना सिखा दिया|
 
काजल से बुनती तस्वीरे,
नींदों से नींदे चुरा गया,
दिल की धड़कन क्या कहती,
उसने तो दिल ही चुरा लिया,
जो हसरत दिल की जाहिर की,
चहरे से पर्दा हटा दिया,
थी चाहत उस पर मरने की,
उसने तो जीना सिखा दिया|
 
वो प्यार के रंग सजा कर के,
जीवन का हर रंग मिला दिया,
अब चाहत क्या नादान-ए-दिल,
दिल को सरताज सजा दिया,
झलके आँखों में ख़ुशी यहाँ,
दिल भी मेरा भर आया है,
धड़कन ना मेरी थम जाये,
खुदा से मेरे मिला दिया,
 
मेरी ख़ामोशी क्या बोले,
ख़ुशी जुबां की क्या बोले,
मुस्कराहट मेरी क्या बोले,
दिल की धड़कन क्या बोले,
जो बिना कहे ही सिखा दिया,
आँखों ही आँखों बता दिया,
दिल के दरिया में उतर-उतर,
बस प्यार करना सिखा दिया|

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भीड़ में रह कर भी गुमनाम सा हूँ,
अपने खड़े हज़ार, पर अनजान सा हूँ,
देता हूँ खुशिया हर एक चाहने वाले तुझे,
फिर भी तेरे बाज़ार में क्यों बे-दाम सा हूँ|

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क्यों खफा है दिल की हर एक धड़कन,

क्यों तन्हाई सी लगती हैं,

क्यों बिना तेरा दीदार हुए,

तेरी सूरत ही दिखती हैं,

क्यों आँखें है ये बुझी-बुझी,

क्यों ये भर आई सी लगती हैं,

क्यों चलते है ख्वाबों के मंजर,

क्यों तेरी परछाई सी लगती हैं|

क्यों दुनिया है वीरानी सी,

क्यों सख्त हवाए लगती हैं,

क्यों भीड़ में भी हूँ तन्हा सा,

क्यों राहें पराई सी लगती है|

क्यों दिन लगता है बोझिल सा,

क्यों रात सजा सी कटती हैं,

जीने की तमन्ना और नहीं बस,

सांस पराई लगती हैं|

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