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नए सपने लेकर,
नए संकल्प लेकर,
नयी रौशनी संग,
नया सवेरा आया है ।
पंख लगा कर गगन में उड़ ले,
आँखों में अरमान भर ले,
खुले आसमान में सितारों संग,
नया सवेरा आया है ।
ओस के मोती सजाये,
कलियों के अरमान जगाये,
कोयल के मधुर गान संग,
नया सवेरा आया है ।
सपने सुहाने नए साल में,
बिखरे मुस्काने नए साल में,
नव संकल्प हो नए साल में,
बढे प्रेम इस नए साल में,
चहु और खुशहाली नए साल में,
प्रेम शकुन की बंसी के संग,
नया सवेरा आया है ।

माँ


उसके चेहरे को देख कर लग रहा था की जैसे यह कई दिनों से सोई नहीं है, चेहरे पर थकान की रेखा उभरती तो थी, पर मात्र एक क्षण के लिए| शायद किसी बात का शकुन था जो थकान को एक पल से ज्यादा टिकने ही नहीं देता| रोज देख कर लगता था कि यह महिला किसी भिखारी गैंग का ही हिस्सा है, लेकिन आज मन ने कहा और मैंने 10 का नोट उसके हाथ पर रख दिया, दिल से दुआयें देती वह आगे निकल गई| शाम को आफिस से वापिस आते समय जब लाल बत्ती पर लगे जाम में रुका तो उसी महिला को फुटपाथ पर बैठा देख कर नज़रे उसी पर केन्द्रित हो गयी| हाथ पंखे से स्ट्रीट लाईट में बैठे, नई स्कूल ड्रेस पहने, नया बेग पास में रखे, एक वर्ण माला की किताब हाथ में लिए, एक 6 वर्षीय बालक को पंखा झलते हुए उस माँ के चहरे पर एक ख़ुशी झलक रही थी| शायद जीवन की कठिनाइयो को सहन कर सीप सम कठोर माँ केआँचल में एक अनमोल मोती मूर्त रूप ले रहा था|


सांसो की करेंसी एक दिन Out of Date हो जायेगी,
तब तक इंतज़ार किया तो बहुत Late हो जायेगी,
कमा लो कुछ खुशियां, कुछ हंसी, कुछ अच्छे कर्म,
भर लो खजाने रिश्तो के, मुस्कानों के,
यही वो पूँजी है तो सात पीढ़ी के काम आएगी।
“भरत” मरने के बाद भी तुम्हे लोगो के बीच जिन्दा कर जायेगी।

।।ॐ अर्हम।।


छोटी छोटी अभिलाषाएं घुट जाती है मन में,
बड़े बड़े सपनो में आखिर ये क्यों होता है,
अंजाम सभी को अपना अपना मालुम है, लेकिन
सपनो में फिर भी मानव यु क्यों खोता है,
सुलझाने की कोशिश में गांठे उलझती जाती है,
जीवन में आखिर ये द्वन्द क्यों होता है,
मानवता का क्रंदन सुन कर हँसता मानव,
मानवता का कत्ल यहाँ पर क्यों होता है,
रिश्ते नातो की भीड़ में यु खड़ा अकेला,
एकाकी सा बोझ जीवन का क्यों ढोता है,
क्या चाहत है,
क्या मंजिल है,
क्या चिन्ता है,
क्या चिंतन है,
क्या जीवन है,
क्या जीना है,
क्या खोना है,
क्या पाना है,
आडम्बर का बोझ हटा कर,
आखिर क्यों नहीं जीता है,
अरमानो के द्वन्द मिटा कर,
“भरत” क्यों नहीं जीता है,
आखिर ऐसा क्यों होता है
आखिर ऐसा क्यों होता है……


जिंदगी बदलती रही, सवालात बदलते रहे,
वक्त बदलता रहा, हालात बदलते रहे,
राहे बदलती रही, राही बदलते रहे,
“भरत” इतने बुरे भी नहीं थे हम,
ना जाने क्यों, लोगो के ख्यालात बदलते रहे।।

दिल से


लड़ते रहे तुफानो से, दिया बनकर,

चलते रहे कांटो पर फूल बनकर,

थी ज़माने की चाहत टूट जाए हम,

बिखरते रहे हम भी खुशबू बनकर।।


होठों में क्या बात छुपी,
मुस्कान अधूरी लगती है,
आँखों में है नींद छुपी,
तलाश अधूरी लगती है,
धड़कन में ख़ामोशी सी,
ये बाते अधूरी लगती है,
ना दिखे अगर तू महफिल में,
महफ़िल अधूरी लगती है,
जाने क्यों तेरे बिन “भरत”,
ये शाम अधूरी लगती है ।।