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Posts Tagged ‘कवि’


उम्मीदों के बाजार में,
जिम्मेदारी के कारोबार में,
बिना कीमत खड़े हो गए हम,
खरीददार आते गए,
टुकड़ो में बिकते चले गए हम,
कोई सपने मेरे खरीद गया,
कभी अपनो को खोते गए हम,
भाग दौड़ की जिंदगी में,
कर्ज चुकाते गए हम,
पल पल में जीने के पलों से,
दूर जाते रहे हम,
कोई घाव देता रहा अनजान बनकर,
कोई मल्हम लगता रहा,
कभी अनजान ने खरीदा,
कभी अपनो ने लूटा,
जब हिसाब लगाने बैठे,
खुद का कोई हिसाब न लगा सके हम,
कभी अपनो के लिए बिके सपने,
कभी सपनो के लिए अपनो से,
“भरत” दूर जाते रहे हम।

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खेल खेल में गुजर गई जिंदगी,
कभी उलझी,
कभी सुलझ गयी जिंदगी।

कभी कुछ नया ढूंढने में, घूमती रही,
कभी किसी के इंतज़ार में, रुकी रही।
कभी कुछ पाने की चाह में, सोचती रही,
कभी कुछ निर्विचार होकर, निकल गयी।

कभी कुछ घड़ियों का सफर भी, मुश्किल सा था,
कभी घड़ी आई भी नही, कि निकल गयी।
खोते रहे जिसको, धीरे धीरे,
उसी को ढूंढती रही जिंदगी।

कभी मजाक मजाक में मजाक, बन गयी,
कभी संजीदगी से, संजीदा बन गयी,
कभी मिली फुरसत तो,
कभी व्यस्तताओं में फंस गयी जिंदगी।

कभी जी जान लगाकर,
कभी खंजर खाकर निकल गयी जिंदगी,
पानी मे उतरे कुछ सोच कर,
कभी डूबने में तो,
कभी उबरने में निकल गयी जिंदगी।

किताबों की जुबान समझ कर,
लगा यही है जिंदगी,
उतरे जो मैदान में,
क्या क्या समझा गयी जिंदगी।

अंधेरों से निकलती रही,
उजालो को तलाशती रही,
आंखों में भरती रही सपने,
दिल मे उमंगे उभारती रही जिंदगी।

उलझती रही, सुलझती रही,
उलझाती और सुलझाती रही जिंदगी।
खेल खेल में गुजर गयी जिंदगी॥

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मुखौटे में छिपे, हज़ार मुखौटे,
कुछ है काले, कुछ है गोरे,
कुछ छुपाना चाहे,
कुछ बतलाना चाहे,
पर वर्तमान की जरूरत,
बन गए हैं मुखौटे।
क्योकि इन मुखौटों ने,
कई राज छुपा रखे है,
कुछ ने चेहरे पे मुखौटे तो,
कुछ ने मुखौटे पे मुखौटे लगा रखे है।

कुछ है उदासी को समेटे,
कुछ ने आँसू छुपा रखे है,
तन्हाई लेकर कुछ बैठे,
कुछ ने दर्द छुपा रखे है,
कुछ ने खुशियां दबा रखी है,
कुछ ने नींदे चुरा रखी है,
कुछ ने मजबूती दी है,
कुछ ने कमजोरी छुपा रखी है,
कुछ ने फरेब दबा रखा है,
कुछ ने ईष्या छुपा रखी है,
कुछ पापी है इसके पीछे,
कुछ ने पूण्य छुपा रखे है,
कुछ रावण है भीतर बैठे,
कुछ ने राम छुपा रखे है,
कुछ ने फूल उगाये अंदर,
कुछ ने जहर छुपा रखे है,
दीपक भी बन बैठे सूरज,
तल पे अंधेरे छुपा रखे है,
मुखोटा ओढ़ कर,
मिलते है हज़ारो मुझसे,
कुछ ने आशीर्वाद रखे है,
कुछ ने खंजर छुपा रखे है॥

दुनिया है यह बहुत अनोखी,
सच्चाई से दूर भागती,
सबको सुख देने की ख्वाहिश,
“भरत” गम अंदर ही दबा रखे है॥
मुखौटे पे मुखौटे लगा रखे है॥

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कभी इधर देखता हूँ,
कभी उधर देखता हूँ,
नशे में मदमस्त,
हर तरफ देखता हूँ,
कुछ को दौलत का नशा है,
कुछ को सत्ता का नशा है,
कुछ को बेवजह नशा है,
कुछ को ख़ुशी का नशा है,
कुछ को अभावो का नशा है,
कुछ को धर्म का नशा है,
कुछ को शक्ति का नशा है,
हर नशे से बचने की राहें ढूंढता हूँ,
इंसान ढूंढता हूँ,
इंसानियत ढूंढता हूँ,
हर इंसान में छुपा,
भगवान ढूंढता हूँ।

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यह ईश्वर का वरदान है,
हर पल दिल के पास है,
जीवन का आधार है,
मेरे माता पिता,
मेरे लिए संसार है।

मुँह में जबान थी,
शब्द सिखाया,
पैरों में जान थी,
चलना सिखाया,
हाथो में पकड़ थी,
पकड़ना सिखाया,
दिमाग मे शक्ति थी,
अच्छा भला सिखाया,
मैं तो था माटी का पुतला,
मुझको एक इंसान बनाया।
भगवान ने मुझको जीवन दिया,
जीना बोलो किसने सिखाया?
बिना आपके मार्गदर्शन के,
जीवन यह बेजार है,
मेरे माता पिता,
मेरे लिए संसार है।

मुझको मुझसे मिलवाया,
दुनिया से परिचित करवाया,
जैसे जैसे बड़ा हुआ,
मुश्किल खड़ी थी राहों में,
अनजानी दुनिया से लड़कर,
तुफानो में चलना सिखाया,
हर कसौटी जीवन की,
हरदम सिर पर हाथ पाया,
जब भी कोई द्वंद हुआ,
हर एक का समाधान पाया,
आज भी जब घर लौटू,
रहता मेरा इंतजार है,
ये मात्र इंसान नही,
अविरल अमृत धार है।
मेरे माता पिता,
मेरे लिए संसार है।

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यह ईश्वर का वरदान है,
हर पल दिल के पास है,
जीवन का आधार है,
मेरे माता पिता,
मेरे लिए संसार है।

मुँह में जबान थी,
शब्द सिखाया,
पैरों में जान थी,
चलना सिखाया,
हाथो में पकड़ थी,
पकड़ना सिखाया,
दिमाग मे शक्ति थी,
अच्छा भला सिखाया,
मैं तो था माटी का पुतला,
मुझको एक इंसान बनाया।
भगवान ने मुझको जीवन दिया,
जीना बोलो किसने सिखाया?
बिना आपके मार्गदर्शन के,
जीवन यह बेजार है,
मेरे माता पिता,
मेरे लिए संसार है।

मुझको मुझसे मिलवाया,
दुनिया से परिचित करवाया,
जैसे जैसे बड़ा हुआ,
मुश्किल खड़ी थी राहों में,
अनजानी दुनिया से लड़कर,
तुफानो में चलना सिखाया,
हर कसौटी जीवन की,
हरदम सिर पर हाथ पाया,
जब भी कोई द्वंद हुआ,
हर एक का समाधान पाया,
आज भी जब घर लौटू,
रहता मेरा इंतजार है,
ये मात्र इंसान नही,
अविरल अमृत धार है।
मेरे माता पिता,
मेरे लिए संसार है।

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दीवाली के शोर ने,
बाजारों की चकाचौंध ने,
और मिठाई की दुकानों ने,
तरसा दिया था उजालों ने,
मेरा घर रोशन किया,
पड़ोसी के दियो के उजालों ने।

बाजारों में बढ़ती महंगाई,
मौके का फायदा उठाती दुकाने,
कुछ खरीदने को तरसता मन,
पर मजबूर करती खाली जेब,
दिल मे मिठास घोल दी,
मीठी शुभकामना देने वालों ने।

रिश्वत से भर लिया घर, लेने वालों ने,
अवसर का लाभ लिया,
फायदा उठाने वालों ने,
पैसे वाले, पटाखें शराब और
जुए में फूंक के सोये,
खाली जेब वाले भूखे ही सोये,
“भरत” ये कैसी दीवाली,
अंधेरे छोड़ दिये उजालों ने,
मांगी थी सुख समृद्धि शांति भरी नींद,
पर सोने ना दिया इन्ही सवालों ने।

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