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Posts Tagged ‘जैन’


शातिर शहर से निकल कर,
गांव की गलियां मिल गयी,
बचपन की कुछ यादें मिल गयी,
गुम हो चुकी हंसी मिल गयी,
आया तो था अपनी थकान मिटाने,
मां के साये में सुकून भरी शाम मिल गयी॥

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अरमानों के बोझ तले,
समय कहीं खो गया है,
परेशानियों का आलम,
अब तो आम हो गया है,
शिकायतों की पोटलियों का,
घर में अम्बार हो गया है,
तकलीफो का भार ढोते ढोते,
जीवन ये बेजार हो गया है,
थकान का आलम ये हैं “भरत”,
शकून नाम का शब्द,
कहीं गुम हो गया है।

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एकरस में डूबे जीवन को,
जो छोड़ कर आगे बढ़ता है,
छोड़ बहाने मुश्किल के,
संघर्षों की अग्नि में तपता है,
बन जाता है नायक वो,
एक अलग कहानी लिखता है।
सर्द हवा या गर्म हवा हो,
आंधी हो, तूफान मचा हो,
पंछी सारे भयभीत होते जब,
बाज उड़ाने भरता है।
संघर्षों की अग्नि में तपता है,
वह अलग कहानी लिखता है।
अवांछित मोड़ हो राहों में,
कंकड़ पत्थर भी मिल जाते है,
कांटो की परवाह नही,
जो अंगारो पर चलता है।
वह अलग कहानी लिखता है।
कुछ नीवों में लग जाता है,
कुछ पैरों में बिछाया जाता है,
जो चोटों को सह जाता है,
वो मंदिर में सजाया जाता है।
जो बैसाखी ले सहारे की,
उजालो में निकलता है,
रात मुश्किलो की आते ही,
वो बेसहारा हो जाता है,
जो खुद के दम पर चमक सके,
अंधेरो से ना डरता है,
खुद बनता है सूरज जग में,
औरो को रोशन करता है।
वह अलग कहानी लिखता है।
जो हिम्मत की भट्टी दहकाएँ
स्वाभिमान की गाथा गाए,
मेहनत की चक्की में पीसकर,
जब भाग्य सितारा चमकता है॥
संघर्षों की अग्नि में तपकर,
वह अलग कहानी लिखता है॥

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पिता पुत्र आपस मे बतिया रहे थे,
किस्से अपने अपने सुना रहे थे,
पिता बोले-
एक समय ऐसा होता था,
जब नौकरी मे इतना पैसा नही होता था,
तब भी हम अच्छे से घर चलाते थे,
और दो पैसे भी बचाते थे,
50 रूपये लेकर जाते थे,
और महीने भर का राशन ले आते थे,
बेटा बोला-
पिताजी आजकल यह मुमकिन नही होता है,
हर दुकान मे CCTV लगा होता है॥

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उसके चेहरे को देख कर लग रहा था की जैसे यह कई दिनों से सोई नहीं है, चेहरे पर थकान की रेखा उभरती तो थी, पर मात्र एक क्षण के लिए| शायद किसी बात का शकुन था जो थकान को एक पल से ज्यादा टिकने ही नहीं देता| रोज देख कर लगता था कि यह महिला किसी भिखारी गैंग का ही हिस्सा है, लेकिन आज मन ने कहा और मैंने 10 का नोट उसके हाथ पर रख दिया, दिल से दुआयें देती वह आगे निकल गई| शाम को आफिस से वापिस आते समय जब लाल बत्ती पर लगे जाम में रुका तो उसी महिला को फुटपाथ पर बैठा देख कर नज़रे उसी पर केन्द्रित हो गयी| हाथ पंखे से स्ट्रीट लाईट में बैठे, नई स्कूल ड्रेस पहने, नया बेग पास में रखे, एक वर्ण माला की किताब हाथ में लिए, एक 6 वर्षीय बालक को पंखा झलते हुए उस माँ के चहरे पर एक ख़ुशी झलक रही थी| शायद जीवन की कठिनाइयो को सहन कर सीप सम कठोर माँ केआँचल में एक अनमोल मोती मूर्त रूप ले रहा था|

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