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Posts Tagged ‘नशा मुक्ति’


पुराने सफर के कुछ अवशेष उठा लो,
भूत में जाकर कुछ यादें चुरा लो,
पुराने, भूले-बिसरे रिश्ते, फिर बनालो,
अपने चाहने वालो को गले लगा लो,
क्या पता इस जीवन में “भरत”,
कब विश्राम हो जाये,
करने तो बहुत कुछ बाकी था,
पर समय ही शेष हो जाये।

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शातिर शहर से निकल कर,
गांव की गलियां मिल गयी,
बचपन की कुछ यादें मिल गयी,
गुम हो चुकी हंसी मिल गयी,
आया तो था अपनी थकान मिटाने,
मां के साये में सुकून भरी शाम मिल गयी॥

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माँ चाहता हूँ बहुत रोकना,
पर यह दिल नही रुक पाता है,
याद तेरी आते ही दिल पागल सा हो जाता है॥
बस रो कर ही रह जाता है॥
वो बाते याद आती है,
वो लम्हे याद आते है,
ये आंखे आंसू बरसाती है,
जब वो दिन याद आते है।

वो रातो को जागती थी,
जब मैं टीवी में खो जाता था,
वो उठ उठ कर झांकती थी,
जब मैं किताबे रख सो जाता था,
वो उठ उठ कर डांटती थी,
मैं परीक्षा के दिनों में जल्दी सो जाता था,
आधे घंटे तो सोने दो,
यह कह कर बड़ा मजा आता था,
वो सुबह सुबह जब चार बजे,
वो मुझको जगाने आती थी,
मैं एक बार तो उठ जाता था,
पर आंख फिर लग जाती थी,
वो प्यार से जब माँ मेरी,
कड़क चाय बना कर लाती थी,
बस एक चुस्की चाय की,
हर नींद उड़ जाया करती थी,
वो मेरी परीक्षा कम होती,
माँ की परेड लग जाया करती थी,
जब परिणाम आता था,
माँ मन मोद मनाया करती थी।
मेरी खुशियों में उसकी,
हर सिसकी दब जाया करती थी।
अब उस चाय को तड़पता हूँ,
उस परीक्षा को मचलता हूँ,
वो सुबह फिर आ जाये,
पर यह ख्वाहिश अब नही मिलती।

वो सुबह सुबह जगाती थी,
स्कूल को देर हो जाएगा बतलाती थी,
वो गर्म पानी ठंडा हो जाएगा,
आवाज़ लगा लगा कर बतलाती थी,
नाश्ते में क्या खायेगा,
पूछ पूछ कर बनाती थी,
जबरदस्ती दूध का गिलास,
हाथ मे थमाती थी,
करता था मैं खूब नखरे,
कभी अगर इच्छा न होती तो,
आज तबियत तो ठीक है कह कर ,
इर्द गिर्द चक्कर चार लगाती थी,
स्कूल के लिए तैयार कर,
दो टॉफी या बादाम या कुछ खर्चा पकड़ाती थी।
माँ आज भी वही बाते है,
पर सुबह जगाने की बात नही मिलती,
स्कूल की जगह आफिस है,
पर वो टॉफी नही मिलती।

माँ सुबह सुबह जब प्यार से
तू हलवा बनाती थी,
खुशबू कमरे तक आते ही,
बांछे तो खिल जाती थी,
आस पड़ोस से जब कोई मिठाई आती थी,
वो बांट के तू खिलाती थी,
ज्यादा में लूंगा, इस बात की,
बहन से लड़ाई जब हो जाती थी,
चुपचाप रसोई से जब भी,
मिठाई चुराई जाती थी,
वो मन खुश हो जाता था,
जब डांट पिलाई जाती थी,
वो मन किलस जाता था,
जब ये देख बहन मुस्काती थी,
अब तो वो मस्ती के,
दिन कहा फिर मिलते है,
वो जो कटी चुपचाप चिकोटी,
आज तो हम तरसते है।

वो बहन के साथ झगड़,
छत पर भग जाया करता था,
धमका कर, बहला कर,
मुझको फुसलाया जाता था,
मां पास बैठा कर मुझको,
जब कुटवाया जाता था,
फिर समझदार बतला कर,
मुझको बहलाया जाता था,
फिर चुपके से कुछ देकर,
मुझको मनाया जाता था।
माँ फिर ले जाओ उस बचपन मे,
वो शरारत आज नही मिलती।

वो सर्दी के मौसम में
जब भी तबियत ढीली हो जाती थी,
या जुकाम भी हो जाती थी,
अदरक वाली चाय या उकाली,
माँ मेरी ले आती थी,
लिपटे लिपटे रजाई में,
मेरी हर इच्छा मिल जाती थी,
और माँ के बुने स्वेटर में,
ठंड आने से कतराती थी,
मन मे अजीब सा लगता था
जब कानो में स्वेटर टोपी की,
हिदायते दी जाती थी,
सब चीजों की आजादी है अब,
पर वो हिदायते अब नही मिलती।

वो धूप में पतंगे उड़ाता तो,
मुझको समझाया जाता था,
वो देर रात तक खेलो तो,
समय बताया जाता था,
वो घर पर आते ही,
मनपसंद खाना मिल जाया करता था,
वो खेल पतंगे मस्ती के लम्हे,
मिल जाया करते थे,
वो गेंद खरीदने के लिए,
माँ से पैसे मिल जाया करते थे,
वो देर रात को हो जाए तो,
उलाहने मिल जाते थे,
की कब तक तेरे लिए,
में यू ही जागती रहूगी,
तेरे पीछे भागती रहूगी,
जब तेरी बीबी आएगी,
तब बतलाऊंगी,
ये चाय के लिए मुझे इतना भगाता है,
जब शादी हो जाएगी,
तब बनवाऊंगी,
आज तो तू मुझे इतना तड़पाता है,
तब मैं भी तुझे बताउंगी,
मां तुम सब सच कहती थी,
अब वो चाय नही मिलती,
सब कुछ मिल जाता है,
पर तेरी डांट नही मिलती।

वो सर्दी अब भी आती है,
वो गर्मी अब भी आती है,
वो सुबह अब भी होती है,
वो राते अब भी ढलती है,
वो त्योहार अब भी आते है,
कुछ लम्हे भी मिल जाते है,
पर फिर भी सुना लगता है,
वो गोद आज नही मिलती,
वो झिड़की आज नही मिलती,
वो थपकी आज नही मिलती,
घर आने पर भी वो तकती आंख नही मिलती,
मिला बहुत कुछ जीवन मे,
पर वो आजादी नही मिलती…….

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कहराते हुए देखे है कुछ लोग, दम तोड़ते हुए देखे है कुछ लोग,

नशे के पाश में जकड़े हुए, सांसों का दामन छोड़ते देखे है कुछ लोग|

दुखी देखे है कुछ लोग, तरसते खाने को कुछ लोग,

परिवार उजड़ते देखे है, संकट में घिरे हुए कुछ लोग|

गाढ़ी कमाई को खर्च करते, आर्थिक दंड भुगतते कुछ लोग,

आफिस में ताने पाते, केरिअर चोपट होते कुछ लोग|

कटोरा हाथ में लेकर, तरसते दानो को कुछ लोग,

कभी कौनो में गिरे, कभी नाली में पड़े कुछ लोग|

मिटाने गम जिन्दगी के, मदिरा में गिरे हुए कुछ लोग,

क्षणिक दुखो को भूल, ग़मों ने डूबते कुछ लोग|

शौक में सेवन करते लोग, आदी बनते जाते लोग,

लगा है दावानल ऐसा, आहूत होते जाते लोग|

गलत कामो की तरफ चलते चले जाते कुछ लोग,

अपराधिक जगत में भी, कमाते नाम ऐसे लोग|

क्यों सदविचारों से भटकते जाते है ये लोग,

नरक के द्वार में ऐसे क्यु घुसते जाते ये लोग,

क्यु परिवार से इतनी नफरत करते है ये लोग,

क्यु डाक्टर की जीविकापार्जन का साधन बनते जाते ये लोग,

आओ सभी मिल जुल बचाए भटके हुए कुछ लोग,

नशा मुक्ति के दीपक आज मिल कर जलाए हम लोग,

कर त्याग नशे का आज नशा मुक्त बांये कुछ लोग,

बन कर पथ दर्शक, आज सभी को राह दिखाए हम लोग||

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