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Posts Tagged ‘बेगवानी’


बनावटी दिखने में,
इतना मशगूल न हो जाना,
सादगी की सुंदरता को,
कभी भूल ना जाना।

सादी रोटी सब्जी सबको,
नसीब हो ही जाती है,
लालची जीभ की मांगें,
कहाँ पूरी हो पाती है,
रखना रसना का ध्यान,
जिह्वा लोलुप ना हो जाना।
सादगी की सुंदरता को,
कभी भूल ना जाना।

जीवन स्तर का पता किसी को,
धन फूकने से नही चलता है,
जीवन स्तर का मापदंड,
जीवन आदर्श ही होता है,
अनावश्यक दिखावे, खर्च में,
तुम फिसल कर ना गिर जाना।
सादगी की सुंदरता को,
कभी भूल ना जाना।

दिखावे की अंधी दुनिया की,
जरूरतें फैलती जाती है,
इन जरूरतों को पूरा करने में,
छीना झपटी बढ़ती जाती है,
सुरसा से इस मुख में,
सुख शांति खोती जाती है,
ऋषि मुनियों के इस देश की,
संस्कृति विलुप्त हो जाती है।
पदार्थो की भौतिक दौड़ में,
“भरत” इतना मग्न न हो जाना,
सादगी ही जीवन का गहना,
बिल्कुल भूल ना जाना।

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स्वपन में, या सजगता से, मोड़ यू ही आते रहेंगे,
विध्वंस कही, कही नव सृजन, गीत यू ही गाते रहेंगे,
पथ अनेकों, मंजिल एक, पथिक को भरमाते रहेंगे,
राहों में द्वंद, मन में अंतर्द्वंद, पथ चुनें पर कौनसा।

प्राणी जन्मा, दुनिया हंसी, रुला कर सबको, चला गया,
बीज दफन हो, फुल खिलाया, फिर बीज देकर चला गया,
तुफानो में बिखरे घरोंदे, कुछ टूटे वृक्ष भी दे गया,
टूटा देख घरोंदा या नव सृजन के गीत गा, पथ चुनु पर कौनसा।

दो पल की यह जिंदगानी, उधारी भी है चुकानी,
व्यापारी बन कर के, आगे की है निधि कमानी,
पल पल का चिंतन करूं, हर पल का स्मरण करूं,
आगे की निधि बनाऊ या पीछे की लुटाऊं,पथ चुनु पर कौनसा।

तेल भरा है दीवट में, बाती को आग लगाऊ,
करू स्नेह संचार जगत में, या जल कर रोशन हो जाऊं,
करू पतंगों से स्नेह या, उनकी मंजिल बन जाऊ,
चिंतन के स्वर समझू या गान विरक्ति का गाऊं, पथ चुनु पर कौनसा।

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जीवन क्या है,
कुछ सांसो का ताना बाना है,
जब तक सांस है,
तब तक साथ है,
सांस छूटी, साथ छूट जाना है,
एक सांस का आना है,
साथ ही एक सांस का जाना है,
अंत मे तुझे अकेले ही रह जाना है,
जब तू छोटा बच्चा था,
सब तुझको पूछा करते थे,
जब जवानी आई,
सब तुझे माना करते थे,
बुढ़ापे में तेरे पास,
सब समय बिताया करते थे,
ये सब एक पड़ाव था,
बस तेरा एक गुमान था,
प्राण निकलते ही तो तू,
अपवित्र हो जाता है,
मरघट ही अंत ठिकाना है,
धु धु कर जल जाना है,
अंतिम पड़ाव चित्ता पर भी,
अकेले ही रह जाना है,
चित्ता के आग पकड़ते ही,
सबको साथ छोड़ जाना है,
कुछ दिन का है रोना धोना,
फिर सब कुछ भूल जाना है,
जी ले सार्थक जीवन,
ना कुछ लेकर आया था,
ना कुछ लेकर जाना है,
जीवन मौत के बीच पड़ाव का,
ज्यादा लाभ कमाना है,
यह जीवन सार्थक बनाना है।

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खेल खेल में गुजर गई जिंदगी,
कभी उलझी,
कभी सुलझ गयी जिंदगी।

कभी कुछ नया ढूंढने में, घूमती रही,
कभी किसी के इंतज़ार में, रुकी रही।
कभी कुछ पाने की चाह में, सोचती रही,
कभी कुछ निर्विचार होकर, निकल गयी।

कभी कुछ घड़ियों का सफर भी, मुश्किल सा था,
कभी घड़ी आई भी नही, कि निकल गयी।
खोते रहे जिसको, धीरे धीरे,
उसी को ढूंढती रही जिंदगी।

कभी मजाक मजाक में मजाक, बन गयी,
कभी संजीदगी से, संजीदा बन गयी,
कभी मिली फुरसत तो,
कभी व्यस्तताओं में फंस गयी जिंदगी।

कभी जी जान लगाकर,
कभी खंजर खाकर निकल गयी जिंदगी,
पानी मे उतरे कुछ सोच कर,
कभी डूबने में तो,
कभी उबरने में निकल गयी जिंदगी।

किताबों की जुबान समझ कर,
लगा यही है जिंदगी,
उतरे जो मैदान में,
क्या क्या समझा गयी जिंदगी।

अंधेरों से निकलती रही,
उजालो को तलाशती रही,
आंखों में भरती रही सपने,
दिल मे उमंगे उभारती रही जिंदगी।

उलझती रही, सुलझती रही,
उलझाती और सुलझाती रही जिंदगी।
खेल खेल में गुजर गयी जिंदगी॥

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बहुत है भाग दौड़ जिंदगी में,
बहुत है तनाव जिंन्दगी में,
तमन्नाएं बहुत छूटी है,
अरमान बहुत टूटे है,
बहुत पाया है,
सबको खुश रखने के लिए,
“भरत” अब ढलती उम्र से पहले,
अपने लिए कुछ कीजिये,
औरो के लिए जरूर जिये मगर,
कुछ अपने लिए भी जी लीजिये।

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नव ऊर्जा का संचार हो,
दुनिया ये गुलजार हो,
खुशियों की कलियां महके,
नव वर्ष का ये आगाज हो।

दुख के बादल छंट जाए,
आनंद की फुहार हो,
खुशबू महके सारे नभ में,
प्रदूषण का काम तमाम हो,
स्वच्छता की पौध लगाए,
स्वस्थता की बयार हो,
खुशियों की कलियां महके,
नव वर्ष का ये आगाज हो।

अच्छाई का संकल्प करें,
बुराई का नाम ना हो,
पर हित मे भी समय बिताए,
दुखी कोई इंसान ना हो,
निज पर शासन करे स्वयं हम,
अनुशासनमय संसार हो,
खुशियों की कलियां महके,
नव वर्ष का ये आगाज हो।

राष्ट्र प्रगति की राह चले,
भ्रष्टाचार का काम तमाम हो,
दुश्मन भी दोस्त बन जाये,
ऐसा हमारा अभियान हो,
कथनी करनी की समानता में,
ना कोई भी व्याधान हो,
खुशियों की कलियां महके,
नव वर्ष का ये आगाज हो।

हर बच्चे को शिक्षा मिले,
हर भूखे को भोजन हो,
हर नारी की हो सुरक्षा,
ना भ्रूण हत्या का नाम हो,
रिश्वतखोरी की चित्ता जलाये,
ना बेरोजगार इंसान हो,
खुशियों की कलियां महके,
नव वर्ष का ये आगाज हो।

कानून के हाथों में मजबूती,
अपराधों का निशान ना हो,
जनता के साथ न्याय करे,
सरकारों का अभियान हो,
स्वस्थ जीवन की मंगल कामना,
अस्पतालों के मंगल गान हो,
खुशियों की कलियां महके,
नव वर्ष का ये आगाज हो।

सूरज भी उगे सुनहरा,
शीतल चंदा का काम हो,
प्राण वायु में श्वास लेकर,
गुणवत्ता पूर्ण आहार हो,
धर्म कर्म की हो प्रबलता,
संत हर एक इंसान हो,
खुशियों की कलियां महके,
नव वर्ष का ये आगाज हो।

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कभी इधर देखता हूँ,
कभी उधर देखता हूँ,
नशे में मदमस्त,
हर तरफ देखता हूँ,
कुछ को दौलत का नशा है,
कुछ को सत्ता का नशा है,
कुछ को बेवजह नशा है,
कुछ को ख़ुशी का नशा है,
कुछ को अभावो का नशा है,
कुछ को धर्म का नशा है,
कुछ को शक्ति का नशा है,
हर नशे से बचने की राहें ढूंढता हूँ,
इंसान ढूंढता हूँ,
इंसानियत ढूंढता हूँ,
हर इंसान में छुपा,
भगवान ढूंढता हूँ।

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