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Posts Tagged ‘भरत बेगवानी’


बीज धरती में दबा,
थी पौधा बन जाने की क्षमता,
सिर्फ मिट्टी और नमी का सहयोग काफी ना था,
मिट्टी से निकल बाहर,
महसूस की थी सूरज की तपिश,
ठंडी हवा के संग बस चहकना काफी ना था,
दिया आसरा तितलियों को,
भंवरो ने भी रसपान किया,
सिर्फ कोपलों का निकलना काफी ना था,
प्रभु चरणों मे अर्पित हुआ,
सहा था टहनी से बिछोह का गम,
बस फूल बन इठलाना काफी ना था,
मुकाम जिंदगी में पाया उसने,
हर बाधा को हटाया उसने,
दुसरो के भरोसे बैठना काफी ना था॥

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मन से मन का मैल मिटाये,
आओ इस दीवाली में,
जग मग मन का हर कण बनाए,
आओ इस दीवाली में,
अमीरो के घर पर शोर शराबा,
चलो गरीब के घर दीप जलाए,
आओ इस दीवाली में।

कुछ ऐसा संकल्प कर ले,
आओ इस दीवाली में,
रोटी रूपी रोशनी महके,
हर एक गरीब की थाली में,
जग में खुशियों के दीप जलाए,
आओ इस दीवाली में।

शुद्ध आचरण की बगिया महके,
दुष्ट आचरण की थाली खाली,
आओ इस दीवाली में,
हो नैतिकता की प्राण प्रतिष्ठा,
मानवता के पुष्प खिलाये,
आओ इस दीवाली में।

तिमिर का कर नाश,
सत्य का दीप जलाये,
आओ इस दीवाली में।
तमसो म ज्योतिर्गमय का
भाव जगाये,
आओ इस दीवाली में।

हो महावीर सी समता साधना,
सुख संतोष समाये मन में,
आओ इस दीवाली में।
कुंठाओ का ह्रास करे,
अंतर्मन का दीप जला कर,
“भरत” आओ इस दीवाली में॥

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भाव के गुलदस्ते से झलकता,
अप्रतिम प्यार हो तुम,
गुदगुदाती, खिलखिलाती,
ह्रदय की झंकार हो तुम,
शून्य सी पड़ी चेतना में,
प्राण का संचार हो तुम,
जिंदगी के वाद्य का,
अनछुआ सा तार हो तुम,
दे दिए सुर कई अनोखे,
सूक्ति का संचार हो तुम,
गीत जो लिखने चला था,
गीत का हर भाव हो तुम,
आँख बंद कर बैठे क्षण भर,
स्वपन का आभास हो तुम,
गर खुले आँखे स्वपन से,
तेज बन साकार हो तुम,
दीप भी तुम, बाती भी तुम,
लौ बन प्रज्ज्वलित होती,
अग्नि की आहुति हो तुम,
कुछ कहा सा, कुछ सुना सा,
कुछ गढ़ा सा, अनगढ़ा सा,
कुछ बुना सा, अनबुना सा,
कुछ सुखद सा, कुछ दुखद सा,
“भरत” अनुभूतियों में बसा ,
मेरा सारा संसार हो तुम।

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