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Posts Tagged ‘भाषण’


अरमानों के बोझ तले,
समय कहीं खो गया है,
परेशानियों का आलम,
अब तो आम हो गया है,
शिकायतों की पोटलियों का,
घर में अम्बार हो गया है,
तकलीफो का भार ढोते ढोते,
जीवन ये बेजार हो गया है,
थकान का आलम ये हैं “भरत”,
शकून नाम का शब्द,
कहीं गुम हो गया है।

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एकरस में डूबे जीवन को,
जो छोड़ कर आगे बढ़ता है,
छोड़ बहाने मुश्किल के,
संघर्षों की अग्नि में तपता है,
बन जाता है नायक वो,
एक अलग कहानी लिखता है।
सर्द हवा या गर्म हवा हो,
आंधी हो, तूफान मचा हो,
पंछी सारे भयभीत होते जब,
बाज उड़ाने भरता है।
संघर्षों की अग्नि में तपता है,
वह अलग कहानी लिखता है।
अवांछित मोड़ हो राहों में,
कंकड़ पत्थर भी मिल जाते है,
कांटो की परवाह नही,
जो अंगारो पर चलता है।
वह अलग कहानी लिखता है।
कुछ नीवों में लग जाता है,
कुछ पैरों में बिछाया जाता है,
जो चोटों को सह जाता है,
वो मंदिर में सजाया जाता है।
जो बैसाखी ले सहारे की,
उजालो में निकलता है,
रात मुश्किलो की आते ही,
वो बेसहारा हो जाता है,
जो खुद के दम पर चमक सके,
अंधेरो से ना डरता है,
खुद बनता है सूरज जग में,
औरो को रोशन करता है।
वह अलग कहानी लिखता है।
जो हिम्मत की भट्टी दहकाएँ
स्वाभिमान की गाथा गाए,
मेहनत की चक्की में पीसकर,
जब भाग्य सितारा चमकता है॥
संघर्षों की अग्नि में तपकर,
वह अलग कहानी लिखता है॥

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छोटे छोटे दिन थे, थी छोटी छोटी रात,

सपने थे बड़े बहुत, मस्ती के जज्बात,
टिमटिमाते तारे देखे, सारी सारी रात,
खेल खिलोने लेकर, जागे सारी रात,
चंदा की चांदनी, सितारों की बारात,
नींद ना आई हमको सारी सारी रात,
खुशियो की खाने खोदी, सारी सारी रात,
आंखों को जगाया हमने सारी सारी रात,
दिन भी गुजरते रहे, गुजर गई रात,
सपने तो बड़े हुए, रोते जज्बात,
आज भी खोजे मन, फिर वही रात॥

बादल खिलौना था, कई थे आकार,
कभी दिखते हाथी घोड़े, थे नाना प्रकार,
हम घूमे, सारी दुनिया फिर घूमती दिखे,
खुशियां फिर चारो तरफ झूमती दिखे,
बन हनुमान हम वीर बने,
सूरज को झटपट मुँह में धरे,
बादल मे बिजली सी रोशनी भरे,
एक इशारे से फिर बिजली गिरे,
काला बादल मेरा, तेरा सफेद लड़े,
वरुण अस्त्र छोड़े तो फिर बूंदे निकले,
हाथ दिखा कर फिर तो चक्र चले,
मस्ती में डूबा दिन अब यू ही ढले,
बेफिक्रे होकर हम तो यू गिर पड़े,
निद्रा हमे ले आंचल में बेसुध करे।

हर जगह अपना ही राज चलता था,
जंगल का राजा मैं शेर बनता था,
सारे जंगल पर मैं राज करता था,
हाथी हो या भालू चाहे,
किसी से ना डरता था,
विहग बन नभ में , उन्मुक्त विचरे,
कभी बन मछली,जल की रानी बने,
कभी बन मेंढक,मस्ती में उछले,
जंगल मे मंगल के साक्षी बने,
स्वछन्द हो जीवन में, आनंद बिखरे।

 

बचपन मे कल्पना की शक्ति फलती थी,
जो भी मन मे आये वो मर्जी चलती थी,
कभी बन डाक्टर इलाज़ करता था,
रोने वाले बच्चों को इंजेक्शन देता था,
कभी बन रोगी मैं गोली लेता था,
कभी बन ईंजन, मैं रेल बनता था,
सारे डिब्बों में ऊर्जा भरता था,
कभी बस कंडक्टर, तो पोस्टमेन बनता था,
कभी नाई बन कर शेव करता था,
कभी प्रधानमंत्री बन, भाषण देता था,
15 अगस्त को सलामी लेता था,
कभी हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई बनता था,
सर्वधर्म समभाव की बाते करता था,
कभी जैन मुनि बन भिक्षा लेता था,
खेल में ही कर्मो का क्षय करता था,
जीवन वो अद्भुत रचना लगती थी,
मन मे खुशी की लहरें बहती रहती थी।

बचपन सुहाना अब याद बहुत आता है,
बच्चो को देख मन हरा हो जाता है,
लौट कर फिर जाना अब ना मुमकिन होगा,
किन्तु मन में वो मस्ती लाना मुश्किल ना होगा,
दुनियादारी में से कुछ समय निकालो,
गुमशुम बचपन को अंदर से खोज निकालो,
“भरत” दोस्तो से फिर अपना मेल बिठालो,
जीवन मे बचपन को फिर से बुलालो।

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निकला था जिंदगी की राह में,
संगी साथी सब थे साथ मे,
हाथ मे हाथ डाले रखे,
सबके साथ चलने की चाह में,
कोई जीत की चाह में दौड़ता रहा,
ख्वाहिशो के अंबार में,
“भरत” हाथ छिटक के छूटता रहा,
सब कुछ पाने की चाह में…..

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पुलिसमेन ने देख लिया, आधी रात को एक,
जा रहा था राह में रामू सीधा नेक,
रामू सीधा नेक, सवाल उससे यह पूछा,
आधी रात को तुम कहाँ से आ रहे हो?
इस समय तुम कहाँ जा रहे हो?
रामू बोला तुमको ये बात अड़ी हैं,
मुझको भाषण सुनने के जल्दी हैं|
पुलिसमेन भन्नाया, फिर रामू से बोला,
आधी रात को तुम दारू पीकर आते हो,
पूछने पर पुलिस को ही बहकाते हो|
रामू बोला, साहब आपको क्यों शक होता हैं,
भाषण बीवी का 12 बजे ही शुरू होता हैं|

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