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Posts Tagged ‘jain’


आज आपको मैं अपनी जन्मभूमि *राजलदेसर* की सैर कराता हूँ।

सुमिरण जन्म भूमि का पल पल, हर क्षण करता हूँ स्मरण,
पूजा तेरी करू रात दिन, करू तुझे शत शत वंदन।

बालू की साडी में लिपटी, स्वर्णिम आभा न्यारी है,
उत्तर दक्षिण गौशाला में, गायों की बात निराली है,
हे जन्म भूमि, हे जन्म भूमि, करता तुझको जीवन अर्पण।
शत शत वंदन, शत शत वंदन

मंदिर और मस्जिद की, यहाँ ऋचाएं सजती है,
कही अजान तो कही आरती, प्यारी धुन थिरकती है,
जैन मंदिर हो या साध्वी केंद्र, असीम शांति मिलती है,
मेंहंदीपुर के बालाजी या माताजी का मंदिर हो,
भैरव बाबा का मंदिर या शिवालय की रौनक हो,
रामदेवजी, गोगा मेडी, मालासी का मंदिर हो,
शेडल माता, लक्षमीनारायण या बाबा धाम का मंदिर हो,
चहु दिशा में बजे घंटिया, करती ह्रदय में एक स्पंदन।
शत शत वंदन, शत शत वंदन

चूड़ी पाटलों की रौनक, हर सुहागन हाथों सजती है,
रंग बिरंगी चुडियो की बाते दूर दूर तक चलती है,
पेड़ो की गर बात हो तो मुह में पानी आ जाता है,
पापड़ के स्वाद का तो कोई भी विकल्प नहीं आता है,
हर मन में हो हर्षोल्लास, यु ही पल्लवित हो ये उपवन।
शत शत वंदन, शत शत वंदन

हर्षित होकर हर ऋतु का यहाँ स्वागत होता है,
तीज त्योहारो पर अब भी मिलने का उपक्रम चलता है,
मेले लगते है उत्सव में, उमंगो की बयारे बहती है,
होली और दीवाली पर तो धमा चोकड़ी चलती है,
भेष बदल बदल कर, घिंदड का आनंद उठाया जाता है,
चंग की थाप पे प्रफुल्लित हो, मन मोद मनाया जाता है,
गणगौर सवारी जब निकले, यह देव भूमि सज जाती है,
हे जननी जन्मभूमि प्यारी, मैं करता हर पल तेरा स्मरण।
*”भरत”* करता तुझको शत शत वंदन।।
शत शत वंदन।।

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मत कर क्रंदन, ओ मेरे मन,

नव दिन आया, कर अभिनन्दन|

भूल पुराने दुःख के दिन,

नव दिन आया, कर अभिनन्दन|

पेड़ों पर फिर पंछी चहके,

सुरम्य हो गया फिर उपवन,

भौर हुई, ये राते बीती,

सुखमय होगा हर एक क्षण||

चलने लगे नभ से सितारे,

आने को आतुर है किरण,

नभ से कालिख हटने लगी,

लगने लगा सिंदूरी गगन||

दिल से दिल का रिश्ता जुड़े,

मिल जाये हर एक का मन,

विश्व शान्ति का मार्ग प्रशस्त हो,

ऐसी बिखरे पहली किरण||

निर्मल धारा बहे जगत में,

कही कभी ना हो अनबन,

खुशहाली का लेप लगा कर,

शीतल हो जाए हर एक मन||

नव दिन आया, कर अभिनन्दन|

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सांसो की करेंसी एक दिन Out of Date हो जायेगी,
तब तक इंतज़ार किया तो बहुत Late हो जायेगी,
कमा लो कुछ खुशियां, कुछ हंसी, कुछ अच्छे कर्म,
भर लो खजाने रिश्तो के, मुस्कानों के,
यही वो पूँजी है तो सात पीढ़ी के काम आएगी।
“भरत” मरने के बाद भी तुम्हे लोगो के बीच जिन्दा कर जायेगी।

।।ॐ अर्हम।।

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जिंदगी बदलती रही, सवालात बदलते रहे,
वक्त बदलता रहा, हालात बदलते रहे,
राहे बदलती रही, राही बदलते रहे,
“भरत” इतने बुरे भी नहीं थे हम,
ना जाने क्यों, लोगो के ख्यालात बदलते रहे।।

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काश कोई तो सुन ले,

मैं इतना क्यों चिल्लाता हूँ,

छलकता देख कर पैमाना,

काश कोई तो आ जाए,

यु सब्र के पैमाने जितना,

गम तो मैं पी जाता हूँ|

कुछ लोग चले आते है जब,

मैं फूलों सा खिल जाता हूँ,

जब रंग बदलते गिरगिट सा,

पतझड़ सा हो जाता हूँ|

दुनिया में लोग हजारो है,

कुछ अपने, कुछ बेगाने है,

बेगानो का क्या कहना,

अपनों के रंग हजारो है,

कुछ फूलों को चुनते-चुनते,

लाखों कांटे पा जाता हूँ|

जिन्दगी के रास्ते भी,

घुमावदार बन पड़े है,

रोज निकलता हूँ,

खुशियाँ ढूंढने,

पर हर जगह गम के व्यापारी पाता हूँ|

उनके दिल की बाते कुछ सुनता हूँ,

कुछ अपनी भी कह आता हूँ,

वो भी हल्के हो जाते है,

मैं भी हल्का हो जाता हूँ||

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भोर हुई, आँखों ने ढूंढा,
मेरे साथी, इधर उधर,
तेरे बिन लगा अधुरा,
ये कैसा आया सवेरा,
आँखों से दो मोती छलके,
गालों पर आकर के बोले,
नहीं करेंगे आगे क्रंदन,
आ कर कर लो अब आलिंगन।

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दौलत की चाह में,
रो रहा है आदमी,
चैन शकुन, जिन्दगी का,
खो रहा है आदमी,
रिश्तों का है भान,
ना दोस्ती का ध्यान,
अपनी ही पीठ में खंजर,
घोप रहा है आदमी,
माँ-बाप, भाई बहिन,
से दूर हो रहा आदमी,
ऊपर से है हँसता,
भीतर से रो रहा है आदमी,
जागने का ढोंग करता,
गहरी मूर्च्छा में है आदमी,
आम की है चाह,
बीज आक के बो रहा आदमी,
सोने की चमक और,
सिक्कों की खनक में,
असली चमक खो रहा आदमी,
इच्छाओं के अनंत आकाश में,
“भरत” क्या खोज रहा है आदमी,
इच्छा परिमाण ही सुख की जड़,
क्यों भूल गया है आदमी।

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