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Posts Tagged ‘Poem’


समरसता के रंगों संग,
हम होली का आगाज करे,
रंग बिखेरे बाहर कुछ,
कुछ का भीतर संचार करे,
ले गुलाल प्यार स्नेह की,
सब पर हम बरसा डाले,
रंग प्यार मोहब्बत ले हथेली,
सबके चेहरे रंग डाले,
हर एक की पीड़ा हर ले हम,
हर एक का दुख साझा कर ले,
खुशियों की बौछारों से,
हर एक का दामन भीगा दे,
ना कोई मन में मेल रखे,
ना मन में कोई मलाल रखे,
बन आसमान सा नील हृदय,
श्वेत कपोत का स्थान रखे,
सूरज ज्यो रक्तिम आभा को,
हर जीवन मे पहुंचाए हम,
ले प्रकृति का ये हरा रंग,
हर घर समृद्धि भर आये हम,
ये श्याम रंग के बादल ज्यो,
प्यार की बारिश बरसायें हम,
स्वर्णिम रंग सा प्रकृति पटल पर,
हर जीवन मे सरसायें हम,
इंद्रधनुष के रंगों सा,
हर एक का जीवन बनाये हम,
कुछ यूं होली का आगाज करे,
हर दिल मे “भरत” उल्लास भरे,
मस्ती में हो हर एक मानव,
दुनिया मे प्यार का रंग भरे।

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स्वपन में, या सजगता से, मोड़ यू ही आते रहेंगे,
विध्वंस कही, कही नव सृजन, गीत यू ही गाते रहेंगे,
पथ अनेकों, मंजिल एक, पथिक को भरमाते रहेंगे,
राहों में द्वंद, मन में अंतर्द्वंद, पथ चुनें पर कौनसा।

प्राणी जन्मा, दुनिया हंसी, रुला कर सबको, चला गया,
बीज दफन हो, फुल खिलाया, फिर बीज देकर चला गया,
तुफानो में बिखरे घरोंदे, कुछ टूटे वृक्ष भी दे गया,
टूटा देख घरोंदा या नव सृजन के गीत गा, पथ चुनु पर कौनसा।

दो पल की यह जिंदगानी, उधारी भी है चुकानी,
व्यापारी बन कर के, आगे की है निधि कमानी,
पल पल का चिंतन करूं, हर पल का स्मरण करूं,
आगे की निधि बनाऊ या पीछे की लुटाऊं,पथ चुनु पर कौनसा।

तेल भरा है दीवट में, बाती को आग लगाऊ,
करू स्नेह संचार जगत में, या जल कर रोशन हो जाऊं,
करू पतंगों से स्नेह या, उनकी मंजिल बन जाऊ,
चिंतन के स्वर समझू या गान विरक्ति का गाऊं, पथ चुनु पर कौनसा।

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खेल खेल में गुजर गई जिंदगी,
कभी उलझी,
कभी सुलझ गयी जिंदगी।

कभी कुछ नया ढूंढने में, घूमती रही,
कभी किसी के इंतज़ार में, रुकी रही।
कभी कुछ पाने की चाह में, सोचती रही,
कभी कुछ निर्विचार होकर, निकल गयी।

कभी कुछ घड़ियों का सफर भी, मुश्किल सा था,
कभी घड़ी आई भी नही, कि निकल गयी।
खोते रहे जिसको, धीरे धीरे,
उसी को ढूंढती रही जिंदगी।

कभी मजाक मजाक में मजाक, बन गयी,
कभी संजीदगी से, संजीदा बन गयी,
कभी मिली फुरसत तो,
कभी व्यस्तताओं में फंस गयी जिंदगी।

कभी जी जान लगाकर,
कभी खंजर खाकर निकल गयी जिंदगी,
पानी मे उतरे कुछ सोच कर,
कभी डूबने में तो,
कभी उबरने में निकल गयी जिंदगी।

किताबों की जुबान समझ कर,
लगा यही है जिंदगी,
उतरे जो मैदान में,
क्या क्या समझा गयी जिंदगी।

अंधेरों से निकलती रही,
उजालो को तलाशती रही,
आंखों में भरती रही सपने,
दिल मे उमंगे उभारती रही जिंदगी।

उलझती रही, सुलझती रही,
उलझाती और सुलझाती रही जिंदगी।
खेल खेल में गुजर गयी जिंदगी॥

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बहुत है भाग दौड़ जिंदगी में,
बहुत है तनाव जिंन्दगी में,
तमन्नाएं बहुत छूटी है,
अरमान बहुत टूटे है,
बहुत पाया है,
सबको खुश रखने के लिए,
“भरत” अब ढलती उम्र से पहले,
अपने लिए कुछ कीजिये,
औरो के लिए जरूर जिये मगर,
कुछ अपने लिए भी जी लीजिये।

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मुखौटे में छिपे, हज़ार मुखौटे,
कुछ है काले, कुछ है गोरे,
कुछ छुपाना चाहे,
कुछ बतलाना चाहे,
पर वर्तमान की जरूरत,
बन गए हैं मुखौटे।
क्योकि इन मुखौटों ने,
कई राज छुपा रखे है,
कुछ ने चेहरे पे मुखौटे तो,
कुछ ने मुखौटे पे मुखौटे लगा रखे है।

कुछ है उदासी को समेटे,
कुछ ने आँसू छुपा रखे है,
तन्हाई लेकर कुछ बैठे,
कुछ ने दर्द छुपा रखे है,
कुछ ने खुशियां दबा रखी है,
कुछ ने नींदे चुरा रखी है,
कुछ ने मजबूती दी है,
कुछ ने कमजोरी छुपा रखी है,
कुछ ने फरेब दबा रखा है,
कुछ ने ईष्या छुपा रखी है,
कुछ पापी है इसके पीछे,
कुछ ने पूण्य छुपा रखे है,
कुछ रावण है भीतर बैठे,
कुछ ने राम छुपा रखे है,
कुछ ने फूल उगाये अंदर,
कुछ ने जहर छुपा रखे है,
दीपक भी बन बैठे सूरज,
तल पे अंधेरे छुपा रखे है,
मुखोटा ओढ़ कर,
मिलते है हज़ारो मुझसे,
कुछ ने आशीर्वाद रखे है,
कुछ ने खंजर छुपा रखे है॥

दुनिया है यह बहुत अनोखी,
सच्चाई से दूर भागती,
सबको सुख देने की ख्वाहिश,
“भरत” गम अंदर ही दबा रखे है॥
मुखौटे पे मुखौटे लगा रखे है॥

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कभी इधर देखता हूँ,
कभी उधर देखता हूँ,
नशे में मदमस्त,
हर तरफ देखता हूँ,
कुछ को दौलत का नशा है,
कुछ को सत्ता का नशा है,
कुछ को बेवजह नशा है,
कुछ को ख़ुशी का नशा है,
कुछ को अभावो का नशा है,
कुछ को धर्म का नशा है,
कुछ को शक्ति का नशा है,
हर नशे से बचने की राहें ढूंढता हूँ,
इंसान ढूंढता हूँ,
इंसानियत ढूंढता हूँ,
हर इंसान में छुपा,
भगवान ढूंढता हूँ।

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यह ईश्वर का वरदान है,
हर पल दिल के पास है,
जीवन का आधार है,
मेरे माता पिता,
मेरे लिए संसार है।

मुँह में जबान थी,
शब्द सिखाया,
पैरों में जान थी,
चलना सिखाया,
हाथो में पकड़ थी,
पकड़ना सिखाया,
दिमाग मे शक्ति थी,
अच्छा भला सिखाया,
मैं तो था माटी का पुतला,
मुझको एक इंसान बनाया।
भगवान ने मुझको जीवन दिया,
जीना बोलो किसने सिखाया?
बिना आपके मार्गदर्शन के,
जीवन यह बेजार है,
मेरे माता पिता,
मेरे लिए संसार है।

मुझको मुझसे मिलवाया,
दुनिया से परिचित करवाया,
जैसे जैसे बड़ा हुआ,
मुश्किल खड़ी थी राहों में,
अनजानी दुनिया से लड़कर,
तुफानो में चलना सिखाया,
हर कसौटी जीवन की,
हरदम सिर पर हाथ पाया,
जब भी कोई द्वंद हुआ,
हर एक का समाधान पाया,
आज भी जब घर लौटू,
रहता मेरा इंतजार है,
ये मात्र इंसान नही,
अविरल अमृत धार है।
मेरे माता पिता,
मेरे लिए संसार है।

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