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Posts Tagged ‘rajaldesar’


कल्पना में घूमते शब्द,
जेहन में कौंधते विचार,
सामने चलते हालात,
दिल मे उबलते जज्बात,
क्या करूँ, क्या ना करू,
मुझसे ये पूछे जिंदगी।

तेज चलती,
धीमी चलती,
कल कल बहती,
खुश रहती,
लालसा में,
आकर्षण में,
प्रार्थना में,
आराधना में,
चाह में,
खयाल में,
क्या मिला जबाब इसका,
मुझसे ये पूछे जिंदगी।

कभी छलावा,
कभी दिखावा,
कभी मर्म,
कभी हकीकत,
कभी भरम,
कभी उमंग,
कभी सफर,
कभी सिफर,
क्या पाया जबाब इसका,
मुझसे ये पूछे जिंदगी।

बड़ी अमृतभरी है,
बड़ी हलाहल सी भी है,
बड़ी उमस है,
बारिश की बूंदे भी है,
बड़ी जद्दोजहद है,
बड़ी ही घुटन है,
लंबी बनु निरर्थक सी,
या सार्थक बनु छोटी सी,
मुझसे ये पूछे जिंदगी।

रोती हुई ये जिंदगी,
हंसती हुई भी जिंदगी,
बंधन में बैठी सोचती,
फुरसत मैं बैठी बुनती,
“भरत” मौत से बदतर हूँ, या
मैं मौत से बेहतर हूँ,
मुझसे ये पूछे जिंदगी।

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पुराने सफर के कुछ अवशेष उठा लो,
भूत में जाकर कुछ यादें चुरा लो,
पुराने, भूले-बिसरे रिश्ते, फिर बनालो,
अपने चाहने वालो को गले लगा लो,
क्या पता इस जीवन में “भरत”,
कब विश्राम हो जाये,
करने तो बहुत कुछ बाकी था,
पर समय ही शेष हो जाये।

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Save water

Save water pg1

Save water pg2

Save water pg6

Save water pg11

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रोटियों की भाषा जानती है,
भूख की वर्णमाला जानती है,
प्यार की परिभाषा जानती है,
हर समस्या की औषध जानती है,
हाँ, यह औरत है,
जो मुझको मुझसे बेहतर जानती है।
कभी मां बनकर मुझे पालती है,
कभी बहन बनकर स्नेह उड़ेलती है,
कभी पत्नी बनकर परछाई बनती है,
कभी बेटी बनकर उमंगे भरती है,
हाँ, यह औरत है,
जो मुझमे ऊर्जा का संचार करती है।
बच्चो को देख हरी होती है,
भाई को देख झगड़ती है,
पति को देख रूठती है,
पिता को देख नखरे करती है,
हाँ, यह औरत है,
जो मुझमे जीवन के रंग भरती है।
यह जीवन भर त्याग करती है,
जीवन भर याद करती है,
जीवन भर साथ देती है,
जीवन भर फिक्र करती है,
हाँ, यह औरत है,
जो जीवन को पूर्ण करती है।

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शातिर शहर से निकल कर,
गांव की गलियां मिल गयी,
बचपन की कुछ यादें मिल गयी,
गुम हो चुकी हंसी मिल गयी,
आया तो था अपनी थकान मिटाने,
मां के साये में सुकून भरी शाम मिल गयी॥

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धुंध सी फैली हुई थी,
मखमली चादर फैली हुई थी,
रोशनी का आभास था,
कुछ साथ चलने का आभास था,
धुंध में जो हाथ डाला तो क्या निकला,
कंधे जो टटोले, तो क्या निकला,
भरत मंजिल की राहों में
तो दो चार हाथ ही मिले,
जश्न के समय पूरा काफिला निकला॥

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ये कैसी तमन्ना है,
जो फिर से जी उठती है,
उनकी एक झलक काफी नही,
ये कैसी चाहत है,
जो अधूरी सी रह जाती है,
उनका मेरे जीवन मे आना काफी नही,
ये कैसा परिंदा है,
जो उन्मुक्त गगन में भी फड़फड़ाता है,
पिंजरा खोल देना ही काफी नही,
अंदर अब भी है घुटन,
तोड़ दो सारी दीवारे आज,
दरवाजा खोल देना काफी नही,
बहुत कुछ पाना है,
मिल जाये दो चार जीवन और,
ये एक जिंदगी काफी नही॥

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