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Posts Tagged ‘rajaldesar’


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आज आपको मैं अपनी जन्मभूमि *राजलदेसर* की सैर कराता हूँ।

सुमिरण जन्म भूमि का पल पल, हर क्षण करता हूँ स्मरण,
पूजा तेरी करू रात दिन, करू तुझे शत शत वंदन।

बालू की साडी में लिपटी, स्वर्णिम आभा न्यारी है,
उत्तर दक्षिण गौशाला में, गायों की बात निराली है,
हे जन्म भूमि, हे जन्म भूमि, करता तुझको जीवन अर्पण।
शत शत वंदन, शत शत वंदन

मंदिर और मस्जिद की, यहाँ ऋचाएं सजती है,
कही अजान तो कही आरती, प्यारी धुन थिरकती है,
जैन मंदिर हो या साध्वी केंद्र, असीम शांति मिलती है,
मेंहंदीपुर के बालाजी या माताजी का मंदिर हो,
भैरव बाबा का मंदिर या शिवालय की रौनक हो,
रामदेवजी, गोगा मेडी, मालासी का मंदिर हो,
शेडल माता, लक्षमीनारायण या बाबा धाम का मंदिर हो,
चहु दिशा में बजे घंटिया, करती ह्रदय में एक स्पंदन।
शत शत वंदन, शत शत वंदन

चूड़ी पाटलों की रौनक, हर सुहागन हाथों सजती है,
रंग बिरंगी चुडियो की बाते दूर दूर तक चलती है,
पेड़ो की गर बात हो तो मुह में पानी आ जाता है,
पापड़ के स्वाद का तो कोई भी विकल्प नहीं आता है,
हर मन में हो हर्षोल्लास, यु ही पल्लवित हो ये उपवन।
शत शत वंदन, शत शत वंदन

हर्षित होकर हर ऋतु का यहाँ स्वागत होता है,
तीज त्योहारो पर अब भी मिलने का उपक्रम चलता है,
मेले लगते है उत्सव में, उमंगो की बयारे बहती है,
होली और दीवाली पर तो धमा चोकड़ी चलती है,
भेष बदल बदल कर, घिंदड का आनंद उठाया जाता है,
चंग की थाप पे प्रफुल्लित हो, मन मोद मनाया जाता है,
गणगौर सवारी जब निकले, यह देव भूमि सज जाती है,
हे जननी जन्मभूमि प्यारी, मैं करता हर पल तेरा स्मरण।
*”भरत”* करता तुझको शत शत वंदन।।
शत शत वंदन।।

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भाव के गुलदस्ते से झलकता,
अप्रतिम प्यार हो तुम,
गुदगुदाती, खिलखिलाती,
ह्रदय की झंकार हो तुम,
शून्य सी पड़ी चेतना में,
प्राण का संचार हो तुम,
जिंदगी के वाद्य का,
अनछुआ सा तार हो तुम,
दे दिए सुर कई अनोखे,
सूक्ति का संचार हो तुम,
गीत जो लिखने चला था,
गीत का हर भाव हो तुम,
आँख बंद कर बैठे क्षण भर,
स्वपन का आभास हो तुम,
गर खुले आँखे स्वपन से,
तेज बन साकार हो तुम,
दीप भी तुम, बाती भी तुम,
लौ बन प्रज्ज्वलित होती,
अग्नि की आहुति हो तुम,
कुछ कहा सा, कुछ सुना सा,
कुछ गढ़ा सा, अनगढ़ा सा,
कुछ बुना सा, अनबुना सा,
कुछ सुखद सा, कुछ दुखद सा,
“भरत” अनुभूतियों में बसा ,
मेरा सारा संसार हो तुम।

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मत कर क्रंदन, ओ मेरे मन,

नव दिन आया, कर अभिनन्दन|

भूल पुराने दुःख के दिन,

नव दिन आया, कर अभिनन्दन|

पेड़ों पर फिर पंछी चहके,

सुरम्य हो गया फिर उपवन,

भौर हुई, ये राते बीती,

सुखमय होगा हर एक क्षण||

चलने लगे नभ से सितारे,

आने को आतुर है किरण,

नभ से कालिख हटने लगी,

लगने लगा सिंदूरी गगन||

दिल से दिल का रिश्ता जुड़े,

मिल जाये हर एक का मन,

विश्व शान्ति का मार्ग प्रशस्त हो,

ऐसी बिखरे पहली किरण||

निर्मल धारा बहे जगत में,

कही कभी ना हो अनबन,

खुशहाली का लेप लगा कर,

शीतल हो जाए हर एक मन||

नव दिन आया, कर अभिनन्दन|

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होठों में क्या बात छुपी,
मुस्कान अधूरी लगती है,
आँखों में है नींद छुपी,
तलाश अधूरी लगती है,
धड़कन में ख़ामोशी सी,
ये बाते अधूरी लगती है,
ना दिखे अगर तू महफिल में,
महफ़िल अधूरी लगती है,
जाने क्यों तेरे बिन “भरत”,
ये शाम अधूरी लगती है ।।

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संतान की खुशियो की खातिर,
पत्थर से पानी निचोड़ते,
खुद को तपा कर धुप में,
तेरे खातिर छाया ढूंढते,
खुद रातों की नींद उड़ा कर,
तेरी मखमली नींदे टंटोलते,
बन कर सहारा खड़े हुए है,
आंधी तुफा में न डोलते,
सह जाते है हर गम यु ही,
मुख से कुछ ना बोलते,
संतान की आँखों में देख चमक,
उसमे ही खुशियाँ टंटोलते,
खुद दिखते है धीर गंभीर,
मुख से ना कुछ बोलते।

पिता की आँखों में आज भी,
अक्स तुम्हारे दीखते है,
धड़कन को कभी भी सुन लेना,
शब्द तुम्हारे रहते है,
वह हाड मांस की काया है,
संतानो के सपने बसते है,
गर आफत जरा तुम पर आये,
वो अस्त व्यस्त से दीखते है,
गर ख़ुशी तुम्हें मिल जाए कोई,
वो मुस्काते से दीखते है।

वो साया जब तक साथ रहे,
माथे पर “भरत” हाथ रहे,
किस्मत की भी औकात नहीं,
राहे मंजिल तक साफ़ रहे।।

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कहराते हुए देखे है कुछ लोग, दम तोड़ते हुए देखे है कुछ लोग,

नशे के पाश में जकड़े हुए, सांसों का दामन छोड़ते देखे है कुछ लोग|

दुखी देखे है कुछ लोग, तरसते खाने को कुछ लोग,

परिवार उजड़ते देखे है, संकट में घिरे हुए कुछ लोग|

गाढ़ी कमाई को खर्च करते, आर्थिक दंड भुगतते कुछ लोग,

आफिस में ताने पाते, केरिअर चोपट होते कुछ लोग|

कटोरा हाथ में लेकर, तरसते दानो को कुछ लोग,

कभी कौनो में गिरे, कभी नाली में पड़े कुछ लोग|

मिटाने गम जिन्दगी के, मदिरा में गिरे हुए कुछ लोग,

क्षणिक दुखो को भूल, ग़मों ने डूबते कुछ लोग|

शौक में सेवन करते लोग, आदी बनते जाते लोग,

लगा है दावानल ऐसा, आहूत होते जाते लोग|

गलत कामो की तरफ चलते चले जाते कुछ लोग,

अपराधिक जगत में भी, कमाते नाम ऐसे लोग|

क्यों सदविचारों से भटकते जाते है ये लोग,

नरक के द्वार में ऐसे क्यु घुसते जाते ये लोग,

क्यु परिवार से इतनी नफरत करते है ये लोग,

क्यु डाक्टर की जीविकापार्जन का साधन बनते जाते ये लोग,

आओ सभी मिल जुल बचाए भटके हुए कुछ लोग,

नशा मुक्ति के दीपक आज मिल कर जलाए हम लोग,

कर त्याग नशे का आज नशा मुक्त बांये कुछ लोग,

बन कर पथ दर्शक, आज सभी को राह दिखाए हम लोग||

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