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Posts Tagged ‘shayari’


इस राखी पर बहना तुम, इतना सा धर्मं निभा देना,

भाई से चाहे मिल ना पाओ,सास ससुर का मान बढ़ा देना,

ननद तुम्हारी शायद, ससुराल रोज ना आ पाए,

जब भी आये मेहमान बनकर, आकर तुरंत ही चली जाए,

बहु तुम्हे वो समझे भी तो, बेटी का धर्म निभा देना,

पीहर के संस्कारों से, ससुराल की बगिया महका देना,

तुम भी हो बेटी किसी की, इस बात को ना भुला देना,

रखना ख्याल सास ससुर का, बस इतना धर्म निभा देना|

 

माँ कहती है बहना तेरी, ससुराल में सुख तू पायेगी,

मिलने गर ना भी आ पाए, माँ-बाप का मान तो बढ़ाएगी,

दे प्यार सभी को इतना तू, इतनी अपनी हो जाएगी,

ननंद की कमी को भी तू, शायद पूरा भर पायेगी,

रिश्ते नातो की गर्माहट से, तू घर को स्वर्ग बनाएगी,

आँखों से चाहे दूर सही, माँ तेरी मोद मनाएगी|

 

जलता हु किस्मत से तेरी, तू दो-दो माँ-बाप पायेगी,

दो-दो माँ के चरणों में, दो-दो स्वर्ग, लुत्फ़ उठाएगी,

पीहर को आबाद किया, ससुराल को स्वर्ग बनाएगी|

बेटी बन कर उभरी है, बहु बनकर जानी जाएगी|

 

रिश्तो की यह गर्माहट, जीवन भर इसे अलाव देना,

जो सास ससुर खुशियाँ बांटे, बादल बन उन्हें समा लेना,

गर गुस्सा उन्हें आ जाए कभी, तुम प्यार भरी फुहार देना,

जब उम्र का तराजू झुकने लगे, चिडचिडापन उनका बढ़ने लगे,

तुम स्नेह का बादल बनकर के, भर भर कर बरसा देना,

जो प्यार दिया मुट्ठी भरकर, “भरत” वो अतुलित प्यार बना देना|

 

भाई की आशीष यही, माँ-बाप की ख्वाहिश यही,

बेटी बन कर तू रही यहाँ, बेटी वहां भी बन जाएगी,

सास ससुर की सेवा में, बस इतना धर्म निभा देना|

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कब से था मैं बेकरार,
कब से था ये इंतज़ार,
“भरत” देखते ही देखते,
भोर कब की हो गयी,
फूल तो खिले गुलशन में,
कलियाँ सारी मर गयी.॥

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आज आपको मैं अपनी जन्मभूमि *राजलदेसर* की सैर कराता हूँ।

सुमिरण जन्म भूमि का पल पल, हर क्षण करता हूँ स्मरण,
पूजा तेरी करू रात दिन, करू तुझे शत शत वंदन।

बालू की साडी में लिपटी, स्वर्णिम आभा न्यारी है,
उत्तर दक्षिण गौशाला में, गायों की बात निराली है,
हे जन्म भूमि, हे जन्म भूमि, करता तुझको जीवन अर्पण।
शत शत वंदन, शत शत वंदन

मंदिर और मस्जिद की, यहाँ ऋचाएं सजती है,
कही अजान तो कही आरती, प्यारी धुन थिरकती है,
जैन मंदिर हो या साध्वी केंद्र, असीम शांति मिलती है,
मेंहंदीपुर के बालाजी या माताजी का मंदिर हो,
भैरव बाबा का मंदिर या शिवालय की रौनक हो,
रामदेवजी, गोगा मेडी, मालासी का मंदिर हो,
शेडल माता, लक्षमीनारायण या बाबा धाम का मंदिर हो,
चहु दिशा में बजे घंटिया, करती ह्रदय में एक स्पंदन।
शत शत वंदन, शत शत वंदन

चूड़ी पाटलों की रौनक, हर सुहागन हाथों सजती है,
रंग बिरंगी चुडियो की बाते दूर दूर तक चलती है,
पेड़ो की गर बात हो तो मुह में पानी आ जाता है,
पापड़ के स्वाद का तो कोई भी विकल्प नहीं आता है,
हर मन में हो हर्षोल्लास, यु ही पल्लवित हो ये उपवन।
शत शत वंदन, शत शत वंदन

हर्षित होकर हर ऋतु का यहाँ स्वागत होता है,
तीज त्योहारो पर अब भी मिलने का उपक्रम चलता है,
मेले लगते है उत्सव में, उमंगो की बयारे बहती है,
होली और दीवाली पर तो धमा चोकड़ी चलती है,
भेष बदल बदल कर, घिंदड का आनंद उठाया जाता है,
चंग की थाप पे प्रफुल्लित हो, मन मोद मनाया जाता है,
गणगौर सवारी जब निकले, यह देव भूमि सज जाती है,
हे जननी जन्मभूमि प्यारी, मैं करता हर पल तेरा स्मरण।
*”भरत”* करता तुझको शत शत वंदन।।
शत शत वंदन।।

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सांसो की करेंसी एक दिन Out of Date हो जायेगी,
तब तक इंतज़ार किया तो बहुत Late हो जायेगी,
कमा लो कुछ खुशियां, कुछ हंसी, कुछ अच्छे कर्म,
भर लो खजाने रिश्तो के, मुस्कानों के,
यही वो पूँजी है तो सात पीढ़ी के काम आएगी।
“भरत” मरने के बाद भी तुम्हे लोगो के बीच जिन्दा कर जायेगी।

।।ॐ अर्हम।।

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होठों में क्या बात छुपी,
मुस्कान अधूरी लगती है,
आँखों में है नींद छुपी,
तलाश अधूरी लगती है,
धड़कन में ख़ामोशी सी,
ये बाते अधूरी लगती है,
ना दिखे अगर तू महफिल में,
महफ़िल अधूरी लगती है,
जाने क्यों तेरे बिन “भरत”,
ये शाम अधूरी लगती है ।।

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संतान की खुशियो की खातिर,
पत्थर से पानी निचोड़ते,
खुद को तपा कर धुप में,
तेरे खातिर छाया ढूंढते,
खुद रातों की नींद उड़ा कर,
तेरी मखमली नींदे टंटोलते,
बन कर सहारा खड़े हुए है,
आंधी तुफा में न डोलते,
सह जाते है हर गम यु ही,
मुख से कुछ ना बोलते,
संतान की आँखों में देख चमक,
उसमे ही खुशियाँ टंटोलते,
खुद दिखते है धीर गंभीर,
मुख से ना कुछ बोलते।

पिता की आँखों में आज भी,
अक्स तुम्हारे दीखते है,
धड़कन को कभी भी सुन लेना,
शब्द तुम्हारे रहते है,
वह हाड मांस की काया है,
संतानो के सपने बसते है,
गर आफत जरा तुम पर आये,
वो अस्त व्यस्त से दीखते है,
गर ख़ुशी तुम्हें मिल जाए कोई,
वो मुस्काते से दीखते है।

वो साया जब तक साथ रहे,
माथे पर “भरत” हाथ रहे,
किस्मत की भी औकात नहीं,
राहे मंजिल तक साफ़ रहे।।

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