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Archive for September, 2010


एक बार एक पड़ोसन,
दूसरी पड़ोसन से बोली,
बहन, तुम्हारे पति तो बड़े,
आशिकमिजाज मालूम होते हैं,
उन्होंने मुझे चाँद कहा|

तभी दूसरी बोली,
नहीं बहन नहीं,
तुम्हे ग़लतफ़हमी हुई होगी,
माना की मेरे पति बेवकूफ हैं,
लेकिन वे इतने भी बेवकूफ,
नहीं हो सकते,
चाँद को भैंस और,
भैंस को चाँद नहीं कह सकते|

तभी पहली बोली,
नहीं बहन मैं सच कह रही हूँ,
उन्होंने मुझे चाँद कहा है,
हाँ यह सही है,
प्रत्यक्षत नहीं अप्रत्यक्षत कहा हैं,
मुझे नहीं,
मेरे बेटे को चाँद का टुकड़ा कहा हैं|

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मजहब नहीं सिखाता, आपस मैं वैर रखना,

हिंदी है हम, वतन है हिन्दोस्तान हमारा,

क्या हम आज यह नहीं कहेंगे,

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा|

आज धर्म के नाम पर,

हर जगह टकराव हो रहा,

खून हो रहा, देश रो रहा,

प्रेम भाई चारा खो रहा,

खून का ये जो समंदर बह रहा,

वो खून है सारा हमारा,

क्या हम आज यह नहीं कहेंगे,

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा|

धर्म मारना नहीं सिखाता,

धर्म घृणा भी नहीं सिखाता,

धर्म वैर भी नहीं सिखाता,

फिर भी धर्म के नाम पर,

आज क्या – क्या नहीं हो रहा,

प्रेम टूट रहा और,

टूट रहा है भाईचारा,

क्या हम आज यह नहीं कहेंगे,

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा|

कुछ लोग निजी हितों की खातिर,

धर्म को बीच में लाते है,

धर्म के नाम पर दंगे करा,

वैर विरोध भड़काते हैं,

लेकिन हम सब चुप है,

और चुप है यह समाज सारा,

भरत, क्या अब भी चुप रहना ठीक हैं,

चाहे जल जाए हमारा ये देश प्यारा,

क्या हम आज यह नहीं कहेंगे,

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा|

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यहाँ पर मेरी समस्त रचनाएँ PDF फाइल में आपके लिए प्रस्तुत हैं|

आपके लिए मेरी रचनाएँ

आपके लिए मेरी रचनाएँ

 


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हर पल जीवन में आगे बढ़ना चाहता हूँ,

सूरज बन सकू, तो कोई गम नहीं,

बस दीप बन जलना चाहता हूँ|

कर सकू तम का नाश,

फैला सकू जग में प्रकाश,

कर सकू उजालो से दोस्ती,

कर सकू हर दिल से भय का ह्रास,

हर राह चलते पथिक के लिए,

ज्योतिपुंज बनना चाहता हूँ|

धुप बन हर तरफ बिखरना चाहता हूँ|

भूखे का मैं बनू सहारा,

प्यासे को जल दान दूं,

हर सांस को जीने का अधिकार,

कोशिश हो सबको शिक्षा की,

मानवता के संगमरमर से निर्मित,

ताज महल बनाना चाहता हूँ|

चांदनी बन धरती पे बिछ जाना चाहता हूँ|

गम के फटे चीथड़ों को,

समृधि के रंगों में रंग दूं,

हर एक विधवा आशाओ की,

मांग अधूरी मैं भर दूं,

सूनी पड़ी पायलो में,

झंकार जगाना चाहता हूँ|

खुशबूं बन कर हर सांस में छा जाना चाहता हूँ|

हर होठ पर हो गीत ख़ुशी के,

गम का कही पर नाम हो,

आंसू के सैलाब हो सूखे,

स्वार्थ की पहचान ना हो,

मैं मानवता की सेवा को अपना,

मजहब बनाना चाहता हूँ|

बन कर हवा, हर एक के जीवन में घुलना चाहता हूँ|

दुश्मन को भी दोस्त बना,

मैं देश समृधि से भर दूं,

हो देश मेरा सोने की चिड़िया,

भारत भाल का चन्द्र बनू,

भव्य भारत निर्माण में मैं,

नीव बनना चाहता हूँ|

बन स्मृति हर दिल में, जिन्दा रहना चाहता हूँ|

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है वट वृक्ष सी छाँव मेरी,

क्यूँ काट टहनियां आज तुम पौधे लगते हो,

खड़ा कर ठूंठ सा मुझको,

क्यूँ अकेला कर जाते हो,

मैं तो हूँ ही जिन्दा तुमसे,

क्यों तुम दूर चले जाते हो,

जो बाँट कर खुशियाँ, जीने का है जो आनंद,

क्यों आज दो ही लोगो में तुम बाँट देना चाहते हो,

हमारी संस्कृति का ताना बना चलता है,

सुख दुःख की घडियो में सहारा महसूस होता है,

गलतियाँ हम जो करते है,

मीठी फटकार दिखती है,

अनुशासन और संयम का,

बोधि पाठ मिलता हैं|

आदर भावनाओ का,

समझोते का भान मिलता है,

प्रतिष्ठा एक की हो तो,

सभी को मान मिलता है,

अनेकता में एकता का,

अनूठा पाठ मिलता है,

भाई मिले भरत जैसा,

पितृ सा राम मिलता है|

जो माने संगठन शक्ति,

उसे ही संयुक्त परिवार, का उपहार मिलता हैं|

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दोस्तों, इस कविता का लिखना तभी सार्थक होगा जब आप इस पर सोच कर, अपनी सोच के कदम इस तरफ बढ़ाएंगे| आशा करता हूँ, कि हम अपने देश कि समकालीन समस्यों पर कुछ सोचे, जो हम से बन पड़ता हैं करे | देश के लिए समर्पित, मेरी तरफ से एक छोटा सा प्रयास|

नंगे नाचे गिद्ध, यहाँ पर फिक्र किसे हैं|

स्वार्थ हो बस सिद्ध, यहाँ पर फिक्र किसे हैं|

लालच का है आज यहाँ पर बोलबाला,

गद्दारी का तो हर एक ने फैशन पाला,

सबको अपनी चाह, देश की चाह किसे है,

जाये देश गढ्ढे में यहाँ पर फिक्र किसे हैं|

होता कभी था देश गुरु आदर्शों का,

ज्ञान संस्कृति की तूती बोला करती थी,

आधुनिकता के नाम मरे संस्कृति यहाँ पर,

मरे चाहे आदर्श, यहाँ पर फिक्र किसे हैं|

लड़ते है बेमतलब घरेलु झगड़ों में,

ताकत लोग दिखाए घरेलु लफड़ों में,

बाँट दिया टुकड़ों में हर एक मानव को,

मरे पडोसी आज यहाँ पर फिक्र किसे हैं|

मरते है यहाँ लोग गरीबी से तंग आकर,

बिकते है यहाँ तन, पेट से आजिज आकर,

भ्रष्ट यहाँ पर हरदम भरते रहे तिजोरी,

सड़ता रहे अनाज, यहाँ पर फिक्र किसे हैं|

कल तक थे जो भाई आज यहाँ लड़ते है,

खुद को हिन्दू मुस्लिम आज वो कहते है,

भगवान, खुदा के नाम पे क़त्ल वो करते है,

प्रेम ही है भगवान, यहाँ पर फिक्र किसे हैं|

दंगे फसादों का क्रम यहाँ ना टूटे,

आज टूटी जो मस्जिद, तो कल मंदिर टूटे,

भाईचारा, प्रेम, दया , सर सबके फूटे,

बेबस खड़ा भगवान, यहाँ पर फिक्र किसे हैं|

भुखमरी, बेकारी यहाँ पर घर करती हैं,

दहेज़ खातिर आज यहाँ कन्या जलती हैं,

लालच खातिर आज यहाँ सब कुछ सही है,

जले चाहे जिन्दा लक्ष्मी, फिक्र किसे हैं|

विश्व गुरु के घर निरक्षरता पसरी है,

वेदों की वाणी आज पाताल बसती है,

राम राज्य का सपना अब सपना ही है,

जयचंद सा हर शख्स, यहाँ पर फिक्र किसे हैं|

राम यहाँ संग्रहालय में सजाये जाते हैं,

रावण तो घर घर में ही पाए जाते है,

सीता तो भूमिगत हो ही चुकी है,

सूर्पनखा हर और, यहाँ पर फिक्र किसे हैं|

रोता है ये दिल, आँख से आंसू निकले,

देख दुर्दशा देश की, दिल कैसे पिघले,

भरतउठा आवाज, यहाँ पर फिक्र किसे हैं|

ये मत कहना तू आज, यहाँ पर फिक्र किसे हैं|

तू है भारत का लाल,आज बस फ़िक्र तुझे है,

ऊँचा हो भारत का भाल, बस फ़िक्र मुझे है|

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