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Archive for the ‘What I Feel’ Category


आओ सुनाऊ तुम्हे एक कहानी,
एक था राजा, एक थी रानी,
खूब किया खर्च, अब कम बचा पानी,
त्राहि चहु और, बस पानी ही पानी।
आओ सुनाऊ……

राजा था जिद्दी, पानी वेस्ट करता,
ना कहा सुनता, घंटो नाहता रहता,
राज्य में सुखा, सब कुओं का पानी,
खूब ढूंढा, पर ना मिले पानी,
पानी न मिलता, पानी ना बनता,
ये तो है, खुदा की मेहरबानी।

हर तरफ दंगे, बस चाहिए पानी,
पर पानी ना मिला, था खत्म अब पानी,
राजा था बेबस, बेबस थी वो रानी,
प्यास से आजिज, मर रहे प्राणी,
मर गया राजा, मर गई रानी,

रह गया अब तो बस आंख में पानी,
त्राहि चहु और, बस पानी ही पानी।

यही है हमारे फ्यूचर की कहानी,
सोचो थोड़ा सा, तुम चिंतन कर लो,
पानी का थोडा, संरक्षण कर लो,
कल न कहना, अब ना बचा पानी,
सुखद अंत से हो खत्म कहानी,
खुश रहे प्रजा, खुश राजा रानी।
आओ सुनाऊ तुम्हे एक कहानी…..

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पुराने सफर के कुछ अवशेष उठा लो,
भूत में जाकर कुछ यादें चुरा लो,
पुराने, भूले-बिसरे रिश्ते, फिर बनालो,
अपने चाहने वालो को गले लगा लो,
क्या पता इस जीवन में “भरत”,
कब विश्राम हो जाये,
करने तो बहुत कुछ बाकी था,
पर समय ही शेष हो जाये।

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Save water

Save water pg1

Save water pg2

Save water pg6

Save water pg11

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रोटियों की भाषा जानती है,
भूख की वर्णमाला जानती है,
प्यार की परिभाषा जानती है,
हर समस्या की औषध जानती है,
हाँ, यह औरत है,
जो मुझको मुझसे बेहतर जानती है।
कभी मां बनकर मुझे पालती है,
कभी बहन बनकर स्नेह उड़ेलती है,
कभी पत्नी बनकर परछाई बनती है,
कभी बेटी बनकर उमंगे भरती है,
हाँ, यह औरत है,
जो मुझमे ऊर्जा का संचार करती है।
बच्चो को देख हरी होती है,
भाई को देख झगड़ती है,
पति को देख रूठती है,
पिता को देख नखरे करती है,
हाँ, यह औरत है,
जो मुझमे जीवन के रंग भरती है।
यह जीवन भर त्याग करती है,
जीवन भर याद करती है,
जीवन भर साथ देती है,
जीवन भर फिक्र करती है,
हाँ, यह औरत है,
जो जीवन को पूर्ण करती है।

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शातिर शहर से निकल कर,
गांव की गलियां मिल गयी,
बचपन की कुछ यादें मिल गयी,
गुम हो चुकी हंसी मिल गयी,
आया तो था अपनी थकान मिटाने,
मां के साये में सुकून भरी शाम मिल गयी॥

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अरमानों के बोझ तले,
समय कहीं खो गया है,
परेशानियों का आलम,
अब तो आम हो गया है,
शिकायतों की पोटलियों का,
घर में अम्बार हो गया है,
तकलीफो का भार ढोते ढोते,
जीवन ये बेजार हो गया है,
थकान का आलम ये हैं “भरत”,
शकून नाम का शब्द,
कहीं गुम हो गया है।

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धुंध सी फैली हुई थी,
मखमली चादर फैली हुई थी,
रोशनी का आभास था,
कुछ साथ चलने का आभास था,
धुंध में जो हाथ डाला तो क्या निकला,
कंधे जो टटोले, तो क्या निकला,
भरत मंजिल की राहों में
तो दो चार हाथ ही मिले,
जश्न के समय पूरा काफिला निकला॥

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