Feeds:
Posts
Comments

Archive for the ‘What I Feel’ Category


मन से मन का मैल मिटाये,
आओ इस दीवाली में,
जग मग मन का हर कण बनाए,
आओ इस दीवाली में,
अमीरो के घर पर शोर शराबा,
चलो गरीब के घर दीप जलाए,
आओ इस दीवाली में।

कुछ ऐसा संकल्प कर ले,
आओ इस दीवाली में,
रोटी रूपी रोशनी महके,
हर एक गरीब की थाली में,
जग में खुशियों के दीप जलाए,
आओ इस दीवाली में।

शुद्ध आचरण की बगिया महके,
दुष्ट आचरण की थाली खाली,
आओ इस दीवाली में,
हो नैतिकता की प्राण प्रतिष्ठा,
मानवता के पुष्प खिलाये,
आओ इस दीवाली में।

तिमिर का कर नाश,
सत्य का दीप जलाये,
आओ इस दीवाली में।
तमसो म ज्योतिर्गमय का
भाव जगाये,
आओ इस दीवाली में।

हो महावीर सी समता साधना,
सुख संतोष समाये मन में,
आओ इस दीवाली में।
कुंठाओ का ह्रास करे,
अंतर्मन का दीप जला कर,
“भरत” आओ इस दीवाली में॥

Advertisements

Read Full Post »


माँ चाहता हूँ बहुत रोकना,
पर यह दिल नही रुक पाता है,
याद तेरी आते ही दिल पागल सा हो जाता है॥
बस रो कर ही रह जाता है॥
वो बाते याद आती है,
वो लम्हे याद आते है,
ये आंखे आंसू बरसाती है,
जब वो दिन याद आते है।

वो रातो को जागती थी,
जब मैं टीवी में खो जाता था,
वो उठ उठ कर झांकती थी,
जब मैं किताबे रख सो जाता था,
वो उठ उठ कर डांटती थी,
मैं परीक्षा के दिनों में जल्दी सो जाता था,
आधे घंटे तो सोने दो,
यह कह कर बड़ा मजा आता था,
वो सुबह सुबह जब चार बजे,
वो मुझको जगाने आती थी,
मैं एक बार तो उठ जाता था,
पर आंख फिर लग जाती थी,
वो प्यार से जब माँ मेरी,
कड़क चाय बना कर लाती थी,
बस एक चुस्की चाय की,
हर नींद उड़ जाया करती थी,
वो मेरी परीक्षा कम होती,
माँ की परेड लग जाया करती थी,
जब परिणाम आता था,
माँ मन मोद मनाया करती थी।
मेरी खुशियों में उसकी,
हर सिसकी दब जाया करती थी।
अब उस चाय को तड़पता हूँ,
उस परीक्षा को मचलता हूँ,
वो सुबह फिर आ जाये,
पर यह ख्वाहिश अब नही मिलती।

वो सुबह सुबह जगाती थी,
स्कूल को देर हो जाएगा बतलाती थी,
वो गर्म पानी ठंडा हो जाएगा,
आवाज़ लगा लगा कर बतलाती थी,
नाश्ते में क्या खायेगा,
पूछ पूछ कर बनाती थी,
जबरदस्ती दूध का गिलास,
हाथ मे थमाती थी,
करता था मैं खूब नखरे,
कभी अगर इच्छा न होती तो,
आज तबियत तो ठीक है कह कर ,
इर्द गिर्द चक्कर चार लगाती थी,
स्कूल के लिए तैयार कर,
दो टॉफी या बादाम या कुछ खर्चा पकड़ाती थी।
माँ आज भी वही बाते है,
पर सुबह जगाने की बात नही मिलती,
स्कूल की जगह आफिस है,
पर वो टॉफी नही मिलती।

माँ सुबह सुबह जब प्यार से
तू हलवा बनाती थी,
खुशबू कमरे तक आते ही,
बांछे तो खिल जाती थी,
आस पड़ोस से जब कोई मिठाई आती थी,
वो बांट के तू खिलाती थी,
ज्यादा में लूंगा, इस बात की,
बहन से लड़ाई जब हो जाती थी,
चुपचाप रसोई से जब भी,
मिठाई चुराई जाती थी,
वो मन खुश हो जाता था,
जब डांट पिलाई जाती थी,
वो मन किलस जाता था,
जब ये देख बहन मुस्काती थी,
अब तो वो मस्ती के,
दिन कहा फिर मिलते है,
वो जो कटी चुपचाप चिकोटी,
आज तो हम तरसते है।

वो बहन के साथ झगड़,
छत पर भग जाया करता था,
धमका कर, बहला कर,
मुझको फुसलाया जाता था,
मां पास बैठा कर मुझको,
जब कुटवाया जाता था,
फिर समझदार बतला कर,
मुझको बहलाया जाता था,
फिर चुपके से कुछ देकर,
मुझको मनाया जाता था।
माँ फिर ले जाओ उस बचपन मे,
वो शरारत आज नही मिलती।

वो सर्दी के मौसम में
जब भी तबियत ढीली हो जाती थी,
या जुकाम भी हो जाती थी,
अदरक वाली चाय या उकाली,
माँ मेरी ले आती थी,
लिपटे लिपटे रजाई में,
मेरी हर इच्छा मिल जाती थी,
और माँ के बुने स्वेटर में,
ठंड आने से कतराती थी,
मन मे अजीब सा लगता था
जब कानो में स्वेटर टोपी की,
हिदायते दी जाती थी,
सब चीजों की आजादी है अब,
पर वो हिदायते अब नही मिलती।

वो धूप में पतंगे उड़ाता तो,
मुझको समझाया जाता था,
वो देर रात तक खेलो तो,
समय बताया जाता था,
वो घर पर आते ही,
मनपसंद खाना मिल जाया करता था,
वो खेल पतंगे मस्ती के लम्हे,
मिल जाया करते थे,
वो गेंद खरीदने के लिए,
माँ से पैसे मिल जाया करते थे,
वो देर रात को हो जाए तो,
उलाहने मिल जाते थे,
की कब तक तेरे लिए,
में यू ही जागती रहूगी,
तेरे पीछे भागती रहूगी,
जब तेरी बीबी आएगी,
तब बतलाऊंगी,
ये चाय के लिए मुझे इतना भगाता है,
जब शादी हो जाएगी,
तब बनवाऊंगी,
आज तो तू मुझे इतना तड़पाता है,
तब मैं भी तुझे बताउंगी,
मां तुम सब सच कहती थी,
अब वो चाय नही मिलती,
सब कुछ मिल जाता है,
पर तेरी डांट नही मिलती।

वो सर्दी अब भी आती है,
वो गर्मी अब भी आती है,
वो सुबह अब भी होती है,
वो राते अब भी ढलती है,
वो त्योहार अब भी आते है,
कुछ लम्हे भी मिल जाते है,
पर फिर भी सुना लगता है,
वो गोद आज नही मिलती,
वो झिड़की आज नही मिलती,
वो थपकी आज नही मिलती,
घर आने पर भी वो तकती आंख नही मिलती,
मिला बहुत कुछ जीवन मे,
पर वो आजादी नही मिलती…….

Read Full Post »


समय का पहिया चलता गया,
कुछ मैं भी उसके साथ चला,
कुछ ढंग बदला,
कुछ रंग बदला,
कुछ तो अपने आप चला।
कुछ ममता के आंचल में,
कुछ अनजानी सी नजरो में,
चंद लोगो की बातों में,
सबको अपनाते अपनाते,
मेरा ये जीवन साथ चला।
अनजाना आभास लिए,
कुछ चातक की सी प्यास लिए,
चंदा सा उजास लिए
तारों की मीठी छांव चला।
कुछ कुछ पुरानी यादें है,
कुछ आधे अधूरे वादे है,
कुछ रास्तो को समझाना है,
कि मैं भी उनके साथ चला।
जीवन यू बदलता जाता है,
बचपन से यह जब निकले,
बंधन में बंधता जाता है,
“भरत” जीवन के पड़ावों में,
मैं तो सबके साथ चला,
दरिया ज्यो मैं प्यास बुझाता,
मैं तो सबके साथ चला॥

Read Full Post »


इस राखी पर बहना तुम, इतना सा धर्मं निभा देना,

भाई से चाहे मिल ना पाओ,सास ससुर का मान बढ़ा देना,

ननद तुम्हारी शायद, ससुराल रोज ना आ पाए,

जब भी आये मेहमान बनकर, आकर तुरंत ही चली जाए,

बहु तुम्हे वो समझे भी तो, बेटी का धर्म निभा देना,

पीहर के संस्कारों से, ससुराल की बगिया महका देना,

तुम भी हो बेटी किसी की, इस बात को ना भुला देना,

रखना ख्याल सास ससुर का, बस इतना धर्म निभा देना|

 

माँ कहती है बहना तेरी, ससुराल में सुख तू पायेगी,

मिलने गर ना भी आ पाए, माँ-बाप का मान तो बढ़ाएगी,

दे प्यार सभी को इतना तू, इतनी अपनी हो जाएगी,

ननंद की कमी को भी तू, शायद पूरा भर पायेगी,

रिश्ते नातो की गर्माहट से, तू घर को स्वर्ग बनाएगी,

आँखों से चाहे दूर सही, माँ तेरी मोद मनाएगी|

 

जलता हु किस्मत से तेरी, तू दो-दो माँ-बाप पायेगी,

दो-दो माँ के चरणों में, दो-दो स्वर्ग, लुत्फ़ उठाएगी,

पीहर को आबाद किया, ससुराल को स्वर्ग बनाएगी|

बेटी बन कर उभरी है, बहु बनकर जानी जाएगी|

 

रिश्तो की यह गर्माहट, जीवन भर इसे अलाव देना,

जो सास ससुर खुशियाँ बांटे, बादल बन उन्हें समा लेना,

गर गुस्सा उन्हें आ जाए कभी, तुम प्यार भरी फुहार देना,

जब उम्र का तराजू झुकने लगे, चिडचिडापन उनका बढ़ने लगे,

तुम स्नेह का बादल बनकर के, भर भर कर बरसा देना,

जो प्यार दिया मुट्ठी भरकर, “भरत” वो अतुलित प्यार बना देना|

 

भाई की आशीष यही, माँ-बाप की ख्वाहिश यही,

बेटी बन कर तू रही यहाँ, बेटी वहां भी बन जाएगी,

सास ससुर की सेवा में, बस इतना धर्म निभा देना|

Read Full Post »


Check this out: गागर में सागर (Gagar Me Sagar) (Hindi Edition) http://www.amazon.in/dp/B0746PZX4F/ref=cm_sw_r_wa_awdo_mJIEzbCCTME4X

Read Full Post »


कब से था मैं बेकरार,
कब से था ये इंतज़ार,
“भरत” देखते ही देखते,
भोर कब की हो गयी,
फूल तो खिले गुलशन में,
कलियाँ सारी मर गयी.॥

Read Full Post »


आज आपको मैं अपनी जन्मभूमि *राजलदेसर* की सैर कराता हूँ।

सुमिरण जन्म भूमि का पल पल, हर क्षण करता हूँ स्मरण,
पूजा तेरी करू रात दिन, करू तुझे शत शत वंदन।

बालू की साडी में लिपटी, स्वर्णिम आभा न्यारी है,
उत्तर दक्षिण गौशाला में, गायों की बात निराली है,
हे जन्म भूमि, हे जन्म भूमि, करता तुझको जीवन अर्पण।
शत शत वंदन, शत शत वंदन

मंदिर और मस्जिद की, यहाँ ऋचाएं सजती है,
कही अजान तो कही आरती, प्यारी धुन थिरकती है,
जैन मंदिर हो या साध्वी केंद्र, असीम शांति मिलती है,
मेंहंदीपुर के बालाजी या माताजी का मंदिर हो,
भैरव बाबा का मंदिर या शिवालय की रौनक हो,
रामदेवजी, गोगा मेडी, मालासी का मंदिर हो,
शेडल माता, लक्षमीनारायण या बाबा धाम का मंदिर हो,
चहु दिशा में बजे घंटिया, करती ह्रदय में एक स्पंदन।
शत शत वंदन, शत शत वंदन

चूड़ी पाटलों की रौनक, हर सुहागन हाथों सजती है,
रंग बिरंगी चुडियो की बाते दूर दूर तक चलती है,
पेड़ो की गर बात हो तो मुह में पानी आ जाता है,
पापड़ के स्वाद का तो कोई भी विकल्प नहीं आता है,
हर मन में हो हर्षोल्लास, यु ही पल्लवित हो ये उपवन।
शत शत वंदन, शत शत वंदन

हर्षित होकर हर ऋतु का यहाँ स्वागत होता है,
तीज त्योहारो पर अब भी मिलने का उपक्रम चलता है,
मेले लगते है उत्सव में, उमंगो की बयारे बहती है,
होली और दीवाली पर तो धमा चोकड़ी चलती है,
भेष बदल बदल कर, घिंदड का आनंद उठाया जाता है,
चंग की थाप पे प्रफुल्लित हो, मन मोद मनाया जाता है,
गणगौर सवारी जब निकले, यह देव भूमि सज जाती है,
हे जननी जन्मभूमि प्यारी, मैं करता हर पल तेरा स्मरण।
*”भरत”* करता तुझको शत शत वंदन।।
शत शत वंदन।।

Read Full Post »

Older Posts »