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Archive for February, 2010


पुलिसमेन ने देख लिया, आधी रात को एक,
जा रहा था राह में रामू सीधा नेक,
रामू सीधा नेक, सवाल उससे यह पूछा,
आधी रात को तुम कहाँ से आ रहे हो?
इस समय तुम कहाँ जा रहे हो?
रामू बोला तुमको ये बात अड़ी हैं,
मुझको भाषण सुनने के जल्दी हैं|
पुलिसमेन भन्नाया, फिर रामू से बोला,
आधी रात को तुम दारू पीकर आते हो,
पूछने पर पुलिस को ही बहकाते हो|
रामू बोला, साहब आपको क्यों शक होता हैं,
भाषण बीवी का 12 बजे ही शुरू होता हैं|
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अमेरिका बोला भारत से, कहो कैसे हो यार|
पाक के बारे में, बोलो क्या है विचार|
 
भारत बोला पाकिस्तान है बिल्कुल सच्चा,
दूजा कोई देश नहीं है उससे अच्छा|
 
अमेरिका बोला, फिर हथियार क्यों बना रहे हो?
बेमतलब ही पाक को तुम डरा रहे हो|
 
भारत बोला, रे बुध्दू कुछ बात समझ,
मैं तुझको उसका कारण भी बता रहा हूँ,
पाक रहे ईमानदार, पाक बना रहे ईमानदार,
इसीलिए तो बम सारे मैं बना रहा हूँ|

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मैंने जग को रोते देखा,
फूलों को मुरझाते देखा,
कभी दिन, कभी रात को देखा,
बहुत कष्ट है इस दुनिया में,
जब जब मैंने इनको देखा,
गूंजा एक विचार,
क्या इसे ही जीवन कहते,
क्या यही जीवन का सार|
 
एक भिखारी जा रहा है,
रखे पेट पर हाथ दो अपने,
सूखे होंठ, पिचके गाल,
ले अन्दर को धंसा हुआ पेट,
इस आशा में दाता से,
कि क्या आज में उनसे पाऊं|
जब से मैंने उसको देखा, गूंजा……..
 
मजदूर कि गोद में लेटा बच्चा,
दूध दूध चिल्लाता हैं,
रो-रो कर हुआ बुरा हाल,
फिर भी कुछ ना पता हैं,
उधर बंगले पर मैडम का कुत्ता,
नखरे कर-कर खाता है|
इंसानों का ऐसा नंगा नाच,
जब-जब मैंने देखा, गूंजा…………
 
हुए अनाथ मां-बाप आज,
अपनी संतानों के हाथों,
जीवन सारा था बीता दिया,
जिनको समर्थ बनाने में|
वे धूल आज फांक रहे,
अनाथाश्रम के द्वारों में,
इन आँखों के रोते देखा, गूंजा………….
 
जिन्दगी बदतर है मानव की,
आज पशु से भी बढ़कर,
कुछ लोग तो खाना चख कर छोड़े,
कुछ पिचके पेट लिए फिरते,
कुछ हुए बेगाने आज यहाँ,
अपनों के ही हाथों से,
व्यथा के आंसू देख सभी के,
गूंजा एक विचार,
क्या इसे ही मानव कहते,
क्या यही है इश्वर का अनुपम अविष्कार…………………………

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चलते चलते राह पुरानी, वो आँखों का निर्मल पानी,
पतझड़ दर्द की एक निशानी, कि आंसू सुख गए|

समां रंगीन, बेजार हवाएं, पकी फसल, वो तूफां आये,
सूरज कहीं गगन खो जाए, रात अँधेरी, घनी घटायें,
बारिश कि वो भरी जवानी, कि आंसू सुख गए|

आशा भरी करते थे दुआए, सुबह शाम वो ख्वाब सजाएँ,
शीशे कि जंजीर उठायें, आँखों में फिर सजा फिजायें,
आगे ज्यों-ज्यों बढे काफिले, कि आंसू सुख गए|

वक़्त तो हैं ज्यू बहता पानी, आज यहाँ कल बना निशानी,
नहीं रुका था, नहीं रुकूंगा, नहीं थका था, नहीं थकूंगा,
आँखों कि बेबाक बयानी, कि आंसू सुख गए|

कुछ लिखना था, कुछ पढ़ना था, कुछ दिखाना था, कुछ कहना था,
कलम रुकी क्यूँ, न रुकना था, आँख उठी क्यों, यूँ रहना था,
दर्द बन गया हंसी ठहाका, कि आंसू सुख गए|

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