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Posts Tagged ‘Hindi poem’


काम, क्रोध, मद, मोह,
लोभ, द्वेष, हिंसा, चोरी,
आलस्य और अहंकार,
ये दस दुर्गुण का दहन करो,
तो मने दशहरा त्योहार,
मने दशहरा त्योहार,
दशो दिशाएं चहके,
मानवता की महक,
हर तरफ महके,
कलयुग में फिर हो जाये,
राम का अवतार,
इन दुर्गुणो का मानव,
कर ले गर संहार।
कर ले गर संहार,
अंदर का रावण जल जाए,
राम राज्य का सपना,
फिर से सच हो जाये,
प्रेम भाईचारा हर तरफ,
फैल सा जाए,
विजयादशमी पर्व,
“भरत” सार्थक हो जाये।

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तू पास होता है,
ये दिल मुस्कुराता है,
तेरा कुछ दूर जाना,
मुझे बिल्कुल ना भाता है,
तेरे सपने सजाने में,
बड़ा आनंद आता है,
तेरी मुस्कान को देखु,
बडा शकून आता है,
काश ये सच हो,
यही सपने सजाता हूँ,
तू है आज पराया,
एक पल भूल जाता हूँ,
“भरत” हसरत लिए दिल मे,
मैं फिर से हार जाता हूँ।

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आज खुशबू ने फिर से,
अपने आप को उभारा,
खुद को सूखे पड़े फूल,
से बाहर निकाला,
चल पड़ी हवा के संग,
कई नथूनों को पुकारा,
कई दिलो को संवारा,
आखिरकार आज फिर उसने,
तोड़ कर निराशा के ताले,
खोल दिये अपने लिए,
नभ के नव उजाले॥

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बादल

बादल जो घिरे,
कई रंगों से भरे,
आपस मे मिले,
मिल कर कड़के,
किरणों से मिले,
सतरंगी आँचल लिए,
कल्पना के पटल पर,
हजारो रंग भर दिए,
आकाश में,
उन्मुक्त विचरते,
पवन के वेग संग,
आंनद में भरते,
हज़ारो बूंद बन,
धरती पर बिखरते,
नाचती कूदती बूंदों सी,
अठखेलिया करते,
मिल कर रेत संग,
उसके सीने में दफन होते,
हर एक के जीवन मे,
स्फूर्ति भरते,
रेत से नीचे जा,
धरती के हृदय में जा मिलते,
अमृत सम ऊपर आकर,
मानव की,
प्यास हरते।
या बादल बन,
फिर से,
रंग प्रकृति में भरते।

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बादल जो घिरे,
कई रंगों से भरे,
आपस मे मिले,
मिल कर कड़के,
किरणों से मिले,
सतरंगी आँचल लिए,
कल्पना के पटल पर,
हजारो रंग भर दिए,
आकाश में,
उन्मुक्त विचरते,
पवन के वेग संग,
आंनद में भरते,
हज़ारो बूंद बन,
धरती पर बिखरते,
नाचती कूदती बूंदों सी,
अठखेलिया करते,
मिल कर रेत संग,
उसके सीने में दफन होते,
हर एक के जीवन मे,
स्फूर्ति भरते,
रेत से नीचे जा,
धरती के हृदय में जा मिलते,
अमृत सम ऊपर आकर,
मानव की,
प्यास हरते।
या बादल बन,
फिर से,
रंग प्रकृति में भरते।

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कल्पना में घूमते शब्द,
जेहन में कौंधते विचार,
सामने चलते हालात,
दिल मे उबलते जज्बात,
क्या करूँ, क्या ना करू,
मुझसे ये पूछे जिंदगी।

तेज चलती,
धीमी चलती,
कल कल बहती,
खुश रहती,
लालसा में,
आकर्षण में,
प्रार्थना में,
आराधना में,
चाह में,
खयाल में,
क्या मिला जबाब इसका,
मुझसे ये पूछे जिंदगी।

कभी छलावा,
कभी दिखावा,
कभी मर्म,
कभी हकीकत,
कभी भरम,
कभी उमंग,
कभी सफर,
कभी सिफर,
क्या पाया जबाब इसका,
मुझसे ये पूछे जिंदगी।

बड़ी अमृतभरी है,
बड़ी हलाहल सी भी है,
बड़ी उमस है,
बारिश की बूंदे भी है,
बड़ी जद्दोजहद है,
बड़ी ही घुटन है,
लंबी बनु निरर्थक सी,
या सार्थक बनु छोटी सी,
मुझसे ये पूछे जिंदगी।

रोती हुई ये जिंदगी,
हंसती हुई भी जिंदगी,
बंधन में बैठी सोचती,
फुरसत मैं बैठी बुनती,
“भरत” मौत से बदतर हूँ, या
मैं मौत से बेहतर हूँ,
मुझसे ये पूछे जिंदगी।

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मेरे और जिंदगी में अक्सर,
कशमकश चलती है,
अगर भागता हूँ पीछे,
तो और तेज भागती है,
थक कर ठहर जाऊ,
तो यह भी थमी सी लगती है,
अगर मैं खुशी से देखु,
तो यह सतरंगी सी दिखती है,
अगर बैठ कर सोचु,
तो यह खाली केनवास सा दिखती है,
अगर मैं बनु ज्यादा चालक,
यह उलझी सी लगती है,
अगर में लेने लगू आनंद,
यह बड़ी सुलझी दिखती है,
जिंदगी अगर में तमन्ना के पहाड़ चुनु,
बहुत दूर सी दिखती है,
अगर मैं चुन लू संतोष का फल,
यह परिपूर्ण सी दिखती है।

दोस्तो एक बात यही समझ मे आयी है, जीवन आपकी अपनी कृति है, जैसा आप बनाना चाहते हो, बनती जाती है, रंग भरो तो रंगीन, तेज चलो तो तेज, आनंद लो तो सहज……

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